Chaturmas 2026: हिंदू धर्म में चातुर्मास का काल अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे ‘चातुर्मास’ का आरंभ माना जाता है। यह समय जप, तप, संयम और ईश्वर की आराधना के लिए सर्वोत्तम है। साल 2026 में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 05:42 बजे शुरू होकर 25 जुलाई की सुबह 08:04 बजे तक रहेगी। उदय तिथि के आधार पर, 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को देवशयनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा और इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत होगी। इस अवधि में सृष्टि का संचालन भगवान शिव संभालते हैं, इसलिए इस समय विष्णु और शिव दोनों की उपासना का विशेष फल मिलता है।

चातुर्मास में सात्विक जीवन और आहार-विहार के नियम
चातुर्मास का अर्थ केवल चार महीने नहीं, बल्कि स्वयं के अनुशासन और सात्विक जीवनशैली को अपनाने का संकल्प है। इन चार महीनों के दौरान भक्त सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति व ध्यान में व्यतीत करते हैं। कई श्रद्धालु इस दौरान भूमि पर शयन करने का संकल्प भी लेते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, चातुर्मास में स्वास्थ्य और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए मासिक आधार पर खाद्य पदार्थों का त्याग किया जाता है। श्रावण मास में हरी पत्तेदार सब्जियां, भाद्रपद में दही और छाछ, आश्विन में दूध (विष्णु चरणामृत को छोड़कर) और कार्तिक मास में काली उड़द व उससे बनी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है।

मांगलिक कार्यों पर रोक और धार्मिक साधना का महत्व
चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित रखने की परंपरा है। इन चार महीनों में नई शुरुआत के बजाय आत्म-चिंतन और साधना पर अधिक बल दिया जाता है। साथ ही, इस दौरान पेड़-पौधे काटने या जमीन खोदने जैसी गतिविधियों से बचने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्रों का जप करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त इन चार महीनों में नियम और श्रद्धा के साथ प्रभु की शरण में रहते हैं, उन पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है और जीवन में सकारात्मकता व समृद्धि का संचार होता है।
संयम से मिलती है मानसिक शांति और आत्मिक शक्ति
चातुर्मास का उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मन को नियंत्रित करना है। यह वह समय है जब व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर मानसिक शांति का अनुभव कर सकता है। इन चार महीनों का पालन करने वाले श्रद्धालु अपनी दिनचर्या में सादगी और शुद्धता को प्रमुखता देते हैं। भले ही इन महीनों में बाहरी मांगलिक कार्यों पर रोक रहती हो, लेकिन आंतरिक प्रगति के लिए यह समय स्वर्ण काल की तरह होता है। नियमपूर्वक चातुर्मास बिताने से न केवल चरित्र का निर्माण होता है, बल्कि मनुष्य को जीवन के प्रति एक नया और सकारात्मक दृष्टिकोण भी मिलता है। यह समय हमें सिखाता है कि किस प्रकार संयमित रहकर प्रभु के सानिध्य में जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
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