Shivaji Jayanti 2026
Shivaji Jayanti 2026: महाराष्ट्र के ‘आराध्य दैवत’ और भारतीय इतिहास के महानतम योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज की आज 396वीं जयंती है। हर वर्ष 19 फरवरी को पूरा देश, विशेषकर महाराष्ट्र, इस दिन को ‘शिव जयंती’ के रूप में बड़े गर्व और उल्लास के साथ मनाता है। शिवाजी महाराज केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी रणनीतिकार और न्यायप्रिय शासक थे, जिन्होंने शून्य से ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की। उनके अद्वितीय साहस और नेतृत्व की कहानियाँ आज भी करोड़ों युवाओं को प्रेरित करती हैं। आइए, इस विशेष अवसर पर हम महाराज के जीवन के उन पहलुओं को जानें, जो अक्सर इतिहास की मुख्यधारा की चर्चाओं में कम दिखाई देते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज के माता-पिता, वीरमाता जीजाबाई और शाहजी भोसले, तथा उनके वीर पुत्रों के बारे में लगभग हर भारतीय परिचित है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाराज का परिवार काफी विस्तृत था? ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, शिवाजी महाराज की 8 पत्नियां थीं, जिन्होंने स्वराज्य के निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोग दिया।
उनकी पत्नियों के नाम इस प्रकार हैं:
महारानी सईबाई (निंबालकर) – युवराज संभाजी महाराज की माता।
महारानी सोयराबाई (मोहिते) – राजाराम प्रथम की माता।
महारानी पुतलाबाई (पलकर)।
महारानी साखवरबाई (गायकवाड)।
महारानी काशीबाई (जाधव)।
महारानी सगुनाबाई (शिर्के)।
महारानी गुणवंताबाई (इंगले)।
महारानी लक्ष्मीबाई (विचारे)।
महाराज की दो संतानें, संभाजी महाराज और राजाराम प्रथम, उनके बाद स्वराज्य के उत्तराधिकारी बने। इसके अतिरिक्त उनकी छह पुत्रियाँ थीं—सखुबाई, रानूबाई, अम्बिकाबाई, दीपाबाई, कमलाबाई और राजकुंवरी बाई।
शिवाजी महाराज के शौर्य का प्रतीक उनकी तलवारें आज भी कौतूहल और श्रद्धा का विषय हैं। इतिहासकारों के अनुसार महाराज के पास तीन प्रमुख तलवारें थीं। ‘भवानी’ तलवार के बारे में मान्यता है कि यह आज भी सातारा के शाही परिवार के पास सुरक्षित है। वहीं, ‘जगदंबा’ तलवार का इतिहास थोड़ा अलग है; वर्ष 1875-76 में प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत यात्रा के दौरान महाराज के वंशजों ने उन्हें यह भेंट की थी, जो वर्तमान में लंदन के ‘रॉयल कलेक्शन ट्रस्ट’ में रखी हुई है। इसे भारत वापस लाने की मांग समय-समय पर उठती रही है। तीसरी तलवार ‘तुलजा’ के बारे में माना जाता है कि यह सिंधुदुर्ग किले में संरक्षित है।
शिवाजी महाराज ने अपने 35 वर्षों के शासनकाल में युद्ध कला की नई परिभाषा गढ़ी। उन्होंने मुगलों और आदिलशाही जैसी विशाल सेनाओं को धूल चटाने के लिए ‘गनीमी कावा’ (छापामार युद्ध नीति) का प्रयोग किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में 300 से अधिक किलों पर विजय प्राप्त की। प्रतापगढ़ का युद्ध, जहाँ उन्होंने अफजल खान का वध किया, और सिंहगढ़ का युद्ध उनके सैन्य कौशल के अद्वितीय उदाहरण हैं। उनकी नौसैनिक शक्ति के कारण ही उन्हें ‘भारतीय नौसेना का जनक’ भी कहा जाता है।
इतनी सफलताओं के बावजूद, कोंकण तट पर स्थित ‘जंजीरा का किला’ (Murud-Janjira) एक ऐसी चुनौती थी जो कभी महाराज के नियंत्रण में नहीं आई। यह जलदुर्ग सिद्दी शासकों के अधीन था। चारों ओर गहरे समुद्र से घिरे होने और अपनी अभेद्य वास्तुकला के कारण मराठा नौसेना के कई प्रयासों के बाद भी इसे जीतना संभव नहीं हो सका। जंजीरा पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए महाराज ने पास ही ‘पद्मदुर्ग’ का निर्माण भी करवाया था, लेकिन जंजीरा हमेशा अजेय ही बना रहा।
6 जून 1674 को रायगढ़ के किले पर शिवाजी महाराज का भव्य राज्याभिषेक हुआ। इसी दिन उन्होंने औपचारिक रूप से ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की और ‘क्षत्रियकुलावतंस श्री राजा शिवछत्रपति’ की पदवी धारण की। मुगलों के साथ उनके संघर्ष ऐतिहासिक हैं। 1664 में सूरत पर आक्रमण, 1670 में सिंहगढ़ की विजय और 1672 में सलहेर का युद्ध, जहाँ मराठों ने मुगलों को आमने-सामने की लड़ाई में हराया, महाराज की महानता को सिद्ध करते हैं। उन्होंने औरंगजेब की सत्ता की जड़ों को हिला कर रख दिया था।
स्वराज्य के इस महानायक ने वर्ष 1680 में रायगढ़ किले पर अंतिम सांस ली। उनकी मृत्यु की तिथि को लेकर 3 और 5 अप्रैल के बीच अलग-अलग मत हैं। 50 से 53 वर्ष की आयु में वे गंभीर बीमारी (पेचिश और तेज बुखार) से पीड़ित हुए। ऐतिहासिक वृतांत बताते हैं कि करीब 12 दिनों तक शारीरिक कष्ट झेलने के बाद इस महान आत्मा ने पार्थिव शरीर त्याग दिया, लेकिन उनके द्वारा बोया गया स्वराज्य का बीज आगे चलकर एक विशाल साम्राज्य बना।
आज शिवाजी महाराज की विरासत को उनके वंशज आगे बढ़ा रहे हैं, जो मुख्य रूप से सतारा और कोल्हापुर के दो राजघरानों में विभाजित हैं।
सतारा घराना: यहाँ से उदयनराजे भोसले (भाजपा सांसद) और शिवेंद्रराजे भोसले (विधायक) सक्रिय हैं। उदयनराजे को महाराज की 13वीं पीढ़ी का वंशज माना जाता है।
कोल्हापुर घराना: यहाँ शाहू छत्रपति द्वितीय (कांग्रेस सांसद) वर्तमान छत्रपति हैं। उनके पुत्र संभाजीराजे छत्रपति सामाजिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय हैं और किलों के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं।
आज भी, जब भी ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ का उद्घोष होता है, तो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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