Anti Conversion Bill: छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘धर्मांतरण’ का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। रायपुर विधानसभा में गुरुवार को गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ पेश किए जाने के साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई। जहाँ सरकार इसे राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भोली-भाली जनता की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण करार देते हुए सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया।
विधेयक के पटल पर रखे जाते ही नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने मोर्चा खोल दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इसी तरह के धर्मांतरण विरोधी कानून देश के 11 अन्य राज्यों में पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के विचाराधीन हैं। महंत ने कहा कि जब मामला न्यायलय में लंबित हो, तो राज्य सरकार को नया कानून लाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विपक्ष ने मांग की कि इस संवेदनशील विधेयक को विस्तृत चर्चा के लिए विधानसभा की प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजा जाना चाहिए।
प्रस्तावित कानून के तहत बल, प्रलोभन, कपट या गलत जानकारी देकर धर्म परिवर्तन कराना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। इस विधेयक की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ‘डिजिटल धर्मांतरण’ को भी शामिल किया गया है। सोशल मीडिया के माध्यम से दिए जाने वाले प्रलोभन अब अपराध की श्रेणी में आएंगे। सजा के प्रावधानों को अत्यंत कठोर बनाया गया है; सामान्य मामलों में 7 से 10 वर्ष की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। यदि पीड़ित नाबालिग या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) वर्ग से है, तो सजा 20 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तक हो सकता है। सामूहिक धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास तक की सजा तय की गई है।
विधेयक के मसौदे में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया गया है, जो हिंदूवादी संगठनों के ‘घर वापसी’ अभियान को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म या पूर्व आस्था में वापस लौटता है, तो उसे ‘धर्म परिवर्तन’ नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही ‘चंगाई सभा’ जैसे आयोजनों को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है ताकि सामूहिक रूप से किए जाने वाले संदेहास्पद धर्म परिवर्तनों पर अंकुश लगाया जा सके।
स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए भी अब प्रक्रिया जटिल होगी। इच्छुक व्यक्ति को जिला मजिस्ट्रेट को पूर्व सूचना देनी होगी। इस सूचना को सार्वजनिक किया जाएगा ताकि 30 दिनों के भीतर कोई भी व्यक्ति अपनी आपत्ति दर्ज करा सके। विधेयक में ‘बल’ की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है, जिसमें शारीरिक शक्ति के साथ-साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी को भी अपराध माना गया है। यह सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिनकी सुनवाई विशेष अदालतों में की जाएगी।
आपत्तियों का जवाब देते हुए गृह मंत्री विजय शर्मा और भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने विधेयक का पुरजोर बचाव किया। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कानून बनाने से नहीं रोका है और न ही इस विषय पर कोई ‘स्टे’ लगाया है। आसंदी द्वारा विपक्ष की आपत्तियों को खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। विजय शर्मा ने विपक्ष के इस कदम को “आदिवासी समाज की पीड़ा से पलायन” करार देते हुए तीखा हमला बोला। सत्ता पक्ष के नारों और विपक्ष के विरोध के बीच सदन का माहौल पूरे दिन तनावपूर्ण बना रहा।
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