छत्तीसगढ़

Chhattisgarh BJP crisis: छत्तीसगढ़ BJP के पहले प्रदेश अध्यक्ष ताराचंद साहू की पार्टी पर संकट: स्वाभिमान मंच को नोटिस, अस्तित्व खतरे में

Chhattisgarh BJP crisis: छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक जमाने में बड़ी छवि रखने वाली छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच अब अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। पार्टी को हाल ही में भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा वार्षिक लेखा-परीक्षित खाते और चुनावी व्यय रिपोर्ट समय पर न जमा करने के कारण कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि यदि पार्टी इस नोटिस का संतोषजनक जवाब नहीं देती है तो उसका पंजीकरण रद्द भी किया जा सकता है।

निर्वाचन आयोग का नोटिस और खतरा

निर्वाचन आयोग ने छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच समेत तीन गैर-मान्यता प्राप्त दलों को नोटिस जारी किया है। आयोग के अनुसार, इन दलों ने 2021-22, 2022-23 और 2023-24 के लेखा-परीक्षित खाते और चुनावी व्यय रिपोर्ट समय पर नहीं दी। यह कदम आयोग की पारदर्शिता और जवाबदेही की गाइडलाइन का उल्लंघन माना गया है। पार्टी अध्यक्ष को 09 अक्टूबर 2025 तक जवाब देना होगा, वहीं इसी दिन आयोग की सुनवाई भी होगी।

छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच: एक नजर

छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की स्थापना 10 अगस्त 2008 को हुई थी। इसके संस्थापक थे दुर्ग के दिग्गज नेता और भाजपा के पहले प्रदेशाध्यक्ष स्व. ताराचंद साहू। साहू छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक कट्टर क्षेत्रीय पहचान के रूप में जाने जाते थे। वे 1990 और 1993 में विधायक और 1996 से 2004 तक लगातार चार बार सांसद रहे। 2008 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने अपना राजनीतिक मंच खड़ा किया।

ताराचंद साहू: शिक्षक से सांसद तक

ताराचंद साहू का जन्म 1 जनवरी 1947 को हुआ था। वे सरकारी स्कूल शिक्षक थे और 1964 में भारतीय जनसंघ से जुड़ गए थे। भाजपा के गठन के बाद से वे पार्टी में सक्रिय रहे और 1990 में पहली बार विधायक चुने गए। उनकी राजनीति का मुख्य आधार छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय स्वाभिमान और जनता से जुड़े रहना था। उन्होंने भाजपा में पहली बार छत्तीसगढ़ प्रदेशाध्यक्ष पद संभाला, लेकिन मतभेदों के चलते पार्टी से अलग हो गए।

स्वाभिमान मंच की राजनीतिक यात्रा

स्वाभिमान मंच ने छत्तीसगढ़ की पहली असली क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर अपनी पहचान बनाई। मंच ने विधानसभा चुनावों में सभी 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, हालांकि सफलता कम मिली। 2009 में खुद साहू ने दुर्ग लोकसभा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और लगभग 2.64 लाख वोट हासिल किए, जो उनकी जमीनी पकड़ को दर्शाता है।

पार्टी की कमजोरी और बिखराव

11 नवंबर 2012 को ताराचंद साहू के आकस्मिक निधन ने स्वाभिमान मंच को बड़ा झटका दिया। उनके बेटे दीपक साहू ने अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन 2014 में उन्होंने पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया। इसके बाद पार्टी का संगठन कमजोर पड़ा और कई सदस्य भाजपा, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी या आम आदमी पार्टी में चले गए। पार्टी का विस्तार अब महज छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड तक फैल चुका था, लेकिन अब इसका अस्तित्व संकट में है।

अब क्या होगा?

चुनाव आयोग का नोटिस और पार्टी के भीतर चल रहे बिखराव ने छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की राजनीतिक जमीन और मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि पार्टी समय पर जवाब नहीं देती है तो उसका पंजीकरण रद्द हो सकता है, जो छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा।

छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की कहानी प्रदेश की राजनीतिक घटनाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। यह मंच एक समय में क्षेत्रीय स्वाभिमान और राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरा था, लेकिन नेतृत्व के अभाव और संगठनात्मक कमजोरियों के कारण अब वह अपनी पहचान खोता जा रहा है। चुनाव आयोग के नोटिस के बाद पार्टी के सामने आने वाले दिनों में बड़ी चुनौतियां और फैसले हो सकते हैं।

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