China PhosCage : दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने के साथ वैज्ञानिक यूरेनियम के नए स्रोत तलाश रहे हैं। इसी कड़ी में चीन के शोधकर्ताओं ने समुद्री पानी से यूरेनियम निकालने की प्रक्रिया को तेज करने वाली एक नई तकनीक विकसित करने का दावा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह तकनीक अमेरिकी ऊर्जा विभाग की ओर से बताए गए पुराने बेंचमार्क की तुलना में कई गुना अधिक क्षमता दिखाती है।
Chinese Academy of Sciences ने बनाया PhosCage
चिंगदाओ स्थित Chinese Academy of Sciences की एक शोध टीम ने इस नए मटीरियल को ‘PhosCage’ नाम दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी आणविक संरचना स्पंज की तरह है, जो समुद्री पानी में मौजूद यूरेनियम को पकड़ने में मदद करती है। इसमें मौजूद फॉस्फेट समूह यूरेनियम आयनों को रासायनिक तरीके से बांधने में अहम भूमिका निभाते हैं।
एक ग्राम मटीरियल से 50.4 मिलीग्राम यूरेनियम
प्राकृतिक समुद्री पानी के नमूनों पर किए गए परीक्षण में PhosCage ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस मटीरियल ने प्रति ग्राम करीब 50.4 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने की क्षमता दिखाई। इसकी तुलना अमेरिकी ऊर्जा विभाग के करीब 6 मिलीग्राम प्रति ग्राम के पुराने बेंचमार्क से की गई है। इस आधार पर नई तकनीक की क्षमता काफी अधिक बताई जा रही है।
समुद्र में इस्तेमाल के लिए बनाई गईं छोटी बीड्स
PhosCage को व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए छोटे-छोटे मिलीमीटर आकार के गोल बीड्स में बदलने का तरीका भी विकसित किया गया है। इससे समुद्री पानी में मटीरियल को फैलाने और बाद में उसे पानी से अलग करने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। इस रूप में किए गए परीक्षणों में बीड्स ने प्रति ग्राम करीब 22.55 मिलीग्राम यूरेनियम हासिल किया।
सात बार इस्तेमाल के बाद भी क्षमता बरकरार
इस तकनीक की एक खास बात इसका दोबारा इस्तेमाल किया जाना है। शोधकर्ताओं के अनुसार, PhosCage से तैयार बीड्स को सात बार तक पुन: इस्तेमाल करने के बाद भी उनकी क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट नहीं देखी गई। यदि बड़े पैमाने पर भी यही प्रदर्शन बरकरार रहता है, तो इससे समुद्री यूरेनियम निकालने की लागत और संसाधन संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।
चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है समुद्री यूरेनियम?
चीन तेजी से अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में परमाणु रिएक्टरों के लिए पर्याप्त यूरेनियम उपलब्ध कराना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। रिपोर्ट में World Nuclear Association के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2024 में चीन ने अपनी खदानों से करीब 1,600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया, जबकि उसके रिएक्टरों की जरूरत लगभग 13,000 टन बताई गई।
घरेलू उत्पादन और जरूरत में बड़ा अंतर
चीन के घरेलू यूरेनियम उत्पादन और परमाणु रिएक्टरों की आवश्यकता के बीच बड़ा अंतर है। इसी वजह से देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे देशों से यूरेनियम हासिल करना पड़ता है। ऐसे में समुद्री पानी से यूरेनियम निकालने की तकनीक भविष्य में चीन की आयात निर्भरता कम करने का एक विकल्प बन सकती है।
महासागरों में जमीन से कहीं ज्यादा यूरेनियम
समुद्री यूरेनियम की सबसे बड़ी खासियत इसकी विशाल अनुमानित उपलब्धता है। मौजूदा अनुमानों के अनुसार, धरती पर यूरेनियम के ज्ञात संसाधन करीब 7.9 मिलियन टन हैं, जबकि महासागरों में लगभग 4.5 बिलियन टन यूरेनियम मौजूद हो सकता है। माना जाता है कि चट्टानों से घुलकर और नदियों के माध्यम से यूरेनियम लंबे समय तक समुद्रों तक पहुंचता रहा है।
कम सांद्रता सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि महासागरों में यूरेनियम की मात्रा बहुत अधिक बताई जाती है, लेकिन समुद्री पानी में इसकी सांद्रता बेहद कम होती है। यही वजह है कि इसे बड़े पैमाने पर और आर्थिक रूप से निकालना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। किसी भी तकनीक की वास्तविक सफलता केवल ज्यादा यूरेनियम पकड़ने की क्षमता पर नहीं, बल्कि लागत, ऊर्जा खपत और औद्योगिक स्तर पर इस्तेमाल पर निर्भर करेगी।
क्या समुद्र बनेगा परमाणु ईंधन का नया स्रोत?
PhosCage जैसी तकनीक समुद्री पानी से यूरेनियम हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम मानी जा सकती है। हालांकि प्रयोगशाला या सीमित समुद्री नमूनों में बेहतर प्रदर्शन और बड़े औद्योगिक स्तर पर कम लागत में उत्पादन करना अलग-अलग चुनौतियां हैं। यदि इस तकनीक को आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाया जा सका, तो महासागरों में मौजूद विशाल यूरेनियम संसाधन भविष्य में परमाणु ऊर्जा के लिए वैकल्पिक स्रोत बन सकते हैं।
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