Clothes Price Hike: अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब केवल कच्चे तेल, गैस और परिवहन लागत तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व में बढ़ती अस्थिरता ने वैश्विक कपड़ा उद्योग की लागत भी बढ़ानी शुरू कर दी है। इसका सीधा असर आने वाले त्योहारी सीजन में आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। T-Shirt, Jeans और दूसरे रोजमर्रा के कपड़े खरीदने के लिए ग्राहकों को पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पॉलिएस्टर और कॉटन की कीमतों में बढ़ोतरी
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, कपड़ा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल पॉलिएस्टर और कॉटन दोनों की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिसका सीधा असर पॉलिएस्टर के उत्पादन पर पड़ता है। पॉलिएस्टर पेट्रोलियम आधारित सिंथेटिक फाइबर है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने के साथ इसकी उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है।
बांग्लादेश में पॉलिएस्टर धागा 25 प्रतिशत तक महंगा
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश की एक कपड़ा फैक्ट्री में युद्ध शुरू होने के कुछ ही सप्ताह के भीतर पॉलिएस्टर धागे की कीमत करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ गई। दूसरी तरफ कॉटन बाजार पर भी सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। उर्वरकों की उपलब्धता, मौसम संबंधी जोखिम और वैश्विक आपूर्ति की अनिश्चितता ने कॉटन की कीमतों को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन परिस्थितियों का असर तैयार कपड़ों की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
कपड़ों की कीमत 10 से 20 प्रतिशत बढ़ने का खतरा
कॉटन और पॉलिएस्टर दोनों के महंगे होने से कपड़ा कंपनियों की मुश्किल बढ़ गई है। आम तौर पर किसी एक फाइबर की कीमत बढ़ने पर कंपनियां दूसरे विकल्प की ओर रुख कर सकती हैं, लेकिन इस समय दोनों प्रमुख फाइबर महंगे हो रहे हैं। ऐसे में उत्पादन लागत को कम करना आसान नहीं है। अनुमान है कि परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहीं तो कपड़ों की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
डाई और केमिकल से लेकर बिजली तक बढ़ी लागत
कपड़ों की कीमत बढ़ने के पीछे केवल कॉटन और पॉलिएस्टर की बढ़ती कीमत जिम्मेदार नहीं है। डाई, केमिकल, तेल, गैस, बिजली और ट्रांसपोर्ट जैसे अन्य खर्च भी बढ़ रहे हैं। एक सामान्य T-Shirt की कुल लागत में कच्चे माल की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत तक हो सकती है, जबकि फैक्ट्री का मार्जिन करीब 2 से 3 प्रतिशत रहता है। इसलिए कंपनियों के लिए बढ़ी लागत को लंबे समय तक खुद वहन करना मुश्किल है।
भारतीय कपड़ा उद्योग पर भी बढ़ा दबाव
भारत वैश्विक स्तर पर प्रमुख टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट सोर्सिंग केंद्रों में शामिल है। हालांकि, बढ़ती उत्पादन लागत और कमजोर वैश्विक मांग ने भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, भारत का रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट जुलाई में सालाना आधार पर 4.5 प्रतिशत घटा। वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में कपड़ा शिपमेंट में करीब 10.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
त्योहारी खरीदारी पर पड़ सकता है असर
भारत में गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के दौरान कपड़ों की बिक्री तेजी से बढ़ती है। ऐसे में अगर युद्ध के कारण तेल, कॉटन, पॉलिएस्टर, ऊर्जा और परिवहन लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो त्योहारी सीजन में कपड़े महंगे हो सकते हैं। हालांकि, वास्तविक कीमत कितनी बढ़ेगी, यह युद्ध की अवधि, कच्चे माल की कीमतों और कंपनियों की मूल्य निर्धारण रणनीति पर निर्भर करेगा। यानी इस बार नई T-Shirt, Jeans या अन्य कपड़े खरीदने से पहले उपभोक्ताओं को अपनी जेब पर थोड़ा ज्यादा बोझ उठाना पड़ सकता है।
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