Crab Farming : ग्रामीण इलाकों और खासकर तटीय क्षेत्रों में किसानों के लिए मछली पालन के साथ अब केकड़ा पालन भी आय का एक नया विकल्प बन रहा है। बाजार में मड क्रैब और ब्लू स्विमिंग क्रैब की मांग को देखते हुए वैज्ञानिक तरीके से इनके उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय खारे पानी जलीय कृषि संस्थान (ICAR-CIBA) की ओर से भी किसानों को केकड़ा पालन की तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है।
मड क्रैब की खेती पर वैज्ञानिक तरीके से काम
केकड़ा पालन में तालाब, जलाशय या विशेष बॉक्स में केकड़ों को निर्धारित अवधि तक रखा जाता है, ताकि वे बाजार में बिक्री योग्य आकार तक पहुंच सकें। भारत में मड क्रैब पालन पर लंबे समय से शोध और तकनीकी काम हो रहा है। ICAR-CIBA के अनुसार Scylla serrata और Scylla olivacea मड क्रैब की प्रमुख प्रजातियां हैं। इनमें ग्रीन मड क्रैब को तेजी से बढ़ने, बड़े आकार और अच्छे बाजार मूल्य के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है।
ब्लू स्विमिंग क्रैब भी बना नया विकल्प
मड क्रैब के अलावा ब्लू स्विमिंग क्रैब के पालन को लेकर भी नई तकनीकों पर काम किया जा रहा है। जून 2026 में ICAR-CIBA ने हैचरी से तैयार बीज और विशेष फीड के इस्तेमाल के साथ ब्लू स्विमिंग क्रैब पालन की तकनीक का प्रदर्शन किया था। रिपोर्ट किए गए डेमो में 105 दिनों के पालन से करीब 1,100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन दर्ज किया गया था और औसत बाजार भाव करीब 500 रुपये प्रति किलोग्राम रहा।
केकड़ा पालन शुरू करने से पहले इन बातों का ध्यान
केकड़ा पालन शुरू करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पानी की व्यवस्था की होती है। तालाब या पालन इकाई में पर्याप्त जगह, पानी का उचित प्रवाह और केकड़ों को बाहर निकलने से रोकने के लिए मजबूत इंतजाम जरूरी हैं। पानी की गुणवत्ता खराब होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए नियमित रूप से पानी की स्थिति और ऑक्सीजन स्तर की निगरानी करना जरूरी माना जाता है।
मड क्रैब के लिए बॉक्स कल्चर तकनीक
मड क्रैब को सीधे तालाब में बहुत अधिक संख्या में छोड़ना हमेशा उचित नहीं माना जाता। इन केकड़ों में आपस में लड़ने और बिल बनाने की प्रवृत्ति होती है, जिससे नुकसान बढ़ सकता है। इसी समस्या को देखते हुए ICAR-CIBA की ओर से बॉक्स कल्चर जैसी तकनीक पर काम किया गया है। इसमें प्रत्येक केकड़े को अलग बॉक्स में रखने से आपसी संघर्ष और नुकसान को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
केकड़ों को क्या खिलाया जाता है?
केकड़ों के अच्छे विकास के लिए संतुलित आहार जरूरी है। आम तौर पर इन्हें मछली और अन्य जलीय जीवों से प्राप्त आहार दिया जाता है। वैज्ञानिक पालन तकनीकों में मछली के मांस के साथ तैयार फीड के इस्तेमाल के उदाहरण भी सामने आए हैं। हालांकि फीड की मात्रा और प्रकार केकड़े की प्रजाति, आकार और पालन व्यवस्था के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
कमाई बाजार भाव और लागत पर निर्भर
केकड़ा पालन से होने वाली कमाई को किसी एक निश्चित रकम के रूप में नहीं देखा जा सकता। आमदनी प्रजाति, उत्पादन, पालन तकनीक, मृत्यु दर, फीड खर्च, श्रम, पानी की व्यवस्था और स्थानीय बाजार भाव जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए हर क्षेत्र में 800 या 1,500 रुपये प्रति किलो का भाव मिलने की उम्मीद करना सही नहीं होगा।
अलग-अलग बाजारों में मिल सकता है अलग भाव
ICAR-CIBA से जुड़े हालिया उदाहरणों में ब्लू स्विमिंग क्रैब के एक डेमो में करीब 500 रुपये प्रति किलोग्राम बाजार भाव दर्ज हुआ। वहीं मड क्रैब की बॉक्स-कल्चर तकनीक से जुड़े एक उदाहरण में स्थानीय बाजार में करीब 500 से 800 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक्री दर्ज की गई। वास्तविक कीमत स्थान और मांग के अनुसार बदल सकती है।
प्रशिक्षण लेकर शुरू करें केकड़ा पालन
जो किसान या ग्रामीण उद्यमी केकड़ा पालन शुरू करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने क्षेत्र की जलवायु, पानी की उपलब्धता, बाजार और प्रजाति की उपयुक्तता की जानकारी लेनी चाहिए। वैज्ञानिक संस्थानों और मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण लेने के बाद शुरुआत करना जोखिम कम कर सकता है। सही तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज, उचित फीड और बाजार की जानकारी के साथ केकड़ा पालन ग्रामीण कारोबार का उपयोगी विकल्प बन सकता है।
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