Dahi Handi 2026: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों फोड़ते हैं दही हांडी? जानिए कृष्ण की माखन चोरी का राज

जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अगले दिन दही हांडी फोड़ने की परंपरा आखिर क्यों निभाई जाती है? इसके पीछे श्रीकृष्ण की बाल लीला और माखन चोरी की कहानी जुड़ी है। ऊंचाई पर लटकी मटकी, गोविंदा की टोली और मानव पिरामिड इस परंपरा के खास प्रतीक माने जाते हैं।

Dahi Handi 2026 : जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी अद्भुत बाल लीलाओं की याद दिलाता है। भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी कई कथाएं आज भी भक्तों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी नटखट शरारतें, गोपियों के घरों से माखन चुराना और सखाओं के साथ मिलकर ऊंचाई पर लटकी मटकी फोड़ना कृष्ण भक्ति का खास हिस्सा मानी जाती हैं। इन्हीं बाल लीलाओं से दही हांडी की परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसे जन्माष्टमी के आसपास पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है।

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कान्हा को माखन और दही क्यों था इतना प्रिय?

धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार, बाल कृष्ण को माखन और दही बेहद प्रिय था। बचपन में कान्हा अपने सखाओं के साथ गोकुल की गलियों में घूमते थे। जिस घर में उन्हें माखन या दही से भरी मटकी दिखाई देती, वहां वे अपने दोस्तों के साथ पहुंच जाते और मौका मिलते ही मटकी से माखन निकालकर खाने लगते थे। कृष्ण की इन शरारतों से गोकुल की गोपियां अक्सर परेशान रहती थीं, लेकिन कान्हा की मासूमियत के आगे उनकी नाराजगी भी ज्यादा देर तक नहीं टिकती थी।

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गोपियों ने माखन बचाने के लिए अपनाया नया तरीका

कहा जाता है कि कान्हा की लगातार बढ़ती माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने माखन-दही की मटकियां जमीन से काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया। उन्हें लगा कि इतनी ऊंचाई पर रखी मटकी तक बाल कृष्ण आसानी से नहीं पहुंच पाएंगे। लेकिन नटखट कान्हा अपनी शरारतों से कहां पीछे हटने वाले थे। उन्होंने इसका भी उपाय खोज लिया और अपने सखाओं को साथ लेकर मटकी तक पहुंचने की योजना बनाई।

सखाओं के साथ मिलकर बनाते थे मानव पिरामिड

कृष्ण अपने दोस्तों को एक जगह इकट्ठा करते और सभी मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हुए मानव पिरामिड बनाते थे। इस पिरामिड में सबसे मजबूत और संतुलित साथी को सबसे ऊपर पहुंचाया जाता था। वह किसी तरह ऊंचाई पर लटकी मटकी तक पहुंचता और उसे फोड़ देता था। मटकी टूटने के बाद उसमें रखा माखन और दही नीचे गिरता, जिसके बाद कान्हा और उनके सखा मिलकर उसका आनंद लेते थे। यही बाल लीला आज दही हांडी उत्सव की मुख्य प्रेरणा मानी जाती है।

दही हांडी में दोहराई जाती है कृष्ण की बाल लीला

दही हांडी उत्सव में भगवान श्रीकृष्ण की इसी बाल लीला को प्रतीकात्मक रूप से दोहराया जाता है। इस दौरान एक मटकी में दही, मक्खन और अन्य सामग्री भरकर उसे रस्सी के सहारे काफी ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोली, जिसे आमतौर पर ‘गोविंदा’ कहा जाता है, मटकी फोड़ने की कोशिश करती है। टोली के सदस्य एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड तैयार करते हैं।

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मटकी फूटते ही गूंज उठता है पूरा माहौल

मानव पिरामिड के सबसे ऊपर चढ़ा गोविंदा आखिरकार मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ता है। मटकी टूटते ही दही और उसमें रखी दूसरी सामग्री नीचे गिरती है। इसके साथ ही आसपास मौजूद लोग भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाने लगते हैं। ढोल-नगाड़ों, भजनों और संगीत के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सव से भर जाता है। कई स्थानों पर मटकी फोड़ने वाली टीमों के बीच प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है।

महाराष्ट्र में दही हांडी का उत्सव है बेहद लोकप्रिय

महाराष्ट्र में दही हांडी उत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां कई स्थानों पर काफी ऊंचाई पर दही हांडी बांधी जाती है और उसे फोड़ने के लिए अलग-अलग गोविंदा टोलियां हिस्सा लेती हैं। प्रतियोगिता में सफल होने वाली टीमों को कई जगह पुरस्कार और इनाम दिए जाते हैं। हालांकि अब दही हांडी केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रही है। देश के कई राज्यों और शहरों में भी भगवान श्रीकृष्ण की इस बाल लीला को उत्साह, भक्ति और सामूहिक उमंग के साथ मनाया जाता है।

दही हांडी सिर्फ उत्सव नहीं, कृष्ण भक्ति का प्रतीक

दही हांडी की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी आस्था और लोक संस्कृति को दर्शाती है। इसमें सामूहिक प्रयास, उत्साह और सहयोग की भावना भी दिखाई देती है। जन्माष्टमी के दौरान कृष्ण जन्म के उत्सव के बाद दही हांडी लोगों को कान्हा के नटखट बाल स्वरूप से जोड़ती है। यही कारण है कि हर वर्ष इस उत्सव को लेकर भक्तों और युवाओं में खास उत्साह देखने को मिलता है।

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Chandan Das

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