Delhi Fireflies Crisis: तेज रोशनी से गायब हो रहे जुगनू, शोध में प्रजनन संकट का खुलासा

Delhi Fireflies Crisis:  बरसात का मौसम शुरू होते ही प्रकृति प्रेमियों की हलचल तेज हो जाती है। हाथों में कम रोशनी वाली टॉर्च और बिना फ्लैश वाले कैमरों के साथ, ये लोग रात के सन्नाटे में जुगनुओं की चमक देखने के लिए निकलते हैं। वे बेहद सतर्क रहते हैं कि उनकी मौजूदगी या रोशनी से इन नन्हे जीवों को कोई परेशानी न हो। हालांकि, हकीकत यह है कि दिल्ली जैसे महानगर में जुगनुओं का बसेरा अब चंद इलाकों तक ही सिमट कर रह गया है।

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हौज खास, यमुना किनारे की झाड़ियाँ और अरावली के आंतरिक हिस्सों में ही अब इन्हें देखा जा सकता है। कभी दक्षिणी दिल्ली के पार्कों में बड़ी संख्या में नजर आने वाले जुगनू, अब कृत्रिम प्रकाश प्रदूषण के कारण लगभग विलुप्त हो चुके हैं। न्यू दिल्ली नेचर सोसायटी द्वारा मानसून के दौरान आयोजित की जाने वाली ‘फायरफ्लाई वॉक’ में सीमित संख्या में लोगों को ले जाया जाता है, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।

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प्रजनन पर संकट: कृत्रिम रोशनी का घातक असर

जुगनुओं की आबादी में आ रही गिरावट का मुख्य कारण विशेषज्ञों ने उनकी प्रजनन प्रक्रिया में बाधा बताया है। जुगनू अंधेरे में अपनी चमक (बायोल्यूमिनेसेंस) के जरिए ही अपने साथी को आकर्षित करते हैं और प्रजनन करते हैं। आधुनिक शहरों में सड़कों, इमारतों और पार्कों में लगी तेज कृत्रिम रोशनी के कारण नर और मादा जुगनू एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते, जिससे उनकी नई पीढ़ी का जन्म प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पार्कों में मोशन सेंसर आधारित लाइटें लगाई जाएं, जो केवल जरूरत के समय ही जलें, तो जुगनुओं के लिए अंधेरे का संरक्षण किया जा सकता है। मई-जून में शुरू होने वाली प्रजनन प्रक्रिया और जुलाई-अगस्त तक रहने वाली उनकी सक्रियता के बीच, रोशनी का यह प्रदूषण उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गया है।

पारिस्थितिकी तंत्र के संकेतक: क्यों जरूरी है इनका संरक्षण?

जुगनू केवल रात की खूबसूरती बढ़ाने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि वे एक स्वस्थ और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के प्रमुख संकेतक (Indicators) भी हैं। मार्च 2026 में जारी भारत की पहली ‘फायरफ्लाई चेकलिस्ट’ के अनुसार, भारत में जुगनुओं की 92 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 61% प्रजातियां केवल हमारे देश के लिए स्थानिक हैं। न्यू दिल्ली नेचर सोसायटी के संस्थापक वेरहेन खन्ना के अनुसार, 2016 के बाद से इनकी संख्या में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट पर्यावरण के प्रति एक चेतावनी है, क्योंकि इनका अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि मिट्टी, पानी और हवा कितनी शुद्ध है। इनकी कमी का मतलब है कि हमारा पर्यावरण असंतुलित हो रहा है।

इको-टूरिज्म का सुनहरा अवसर: भारत के पास बड़ी संभावनाएं

यदि हम जुगनुओं का सही ढंग से संरक्षण करना सीख जाएं, तो यह न केवल पर्यावरण की सुरक्षा करेगा बल्कि इको-टूरिज्म (Eco-tourism) के लिए एक बड़ा अवसर भी बनेगा। जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया और बाली जैसे देशों में ‘फायरफ्लाई टूरिज्म’ करोड़ों रुपये का एक बड़ा उद्योग बन चुका है। भारत में भी महाराष्ट्र और पश्चिमी घाट के कुछ हिस्सों में ऐसे आयोजन हो रहे हैं, जो लोगों को प्रकृति से जोड़ रहे हैं। दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में भी यदि जुगनुओं के अनुकूल वातावरण बनाया जाए, तो यह न केवल वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक गंतव्य बन सकता है, बल्कि शहरी पर्यावरण को सुधारने की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम होगा।

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Chandan Das

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