Delhi Riots
Delhi Riots Verdict: दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं के रूप में आरोपित यूएपीए (UAPA) कैदियों की जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और गहरी टिप्पणी की है। सोमवार, 5 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ प्रदान करता है और यह मौलिक अधिकारों में सर्वोच्च है, लेकिन यह अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने रेखांकित किया कि अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रता कानूनी प्रावधानों और स्थापित न्यायिक प्रक्रियाओं के अधीन है। न्यायालय के इस रुख ने साफ कर दिया है कि जमानत के फैसलों में मानवाधिकारों के साथ-साथ अपराध की गंभीरता और वैधानिक बाधाओं (जैसे UAPA की धारा 43D) का संतुलन अनिवार्य है।
साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों की बड़ी साजिश रचने के आरोप में कई छात्र नेता और कार्यकर्ता पिछले पांच वर्षों से भी अधिक समय से जेल में बंद हैं। जमानत की गुहार लगाने वालों में प्रमुख रूप से उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम शामिल हैं। इन आरोपियों पर दिल्ली पुलिस ने कड़े आतंकवाद विरोधी कानून ‘यूएपीए’ के तहत मुकदमा दर्ज किया है। बचाव पक्ष का तर्क रहा है कि इतने लंबे समय तक बिना ट्रायल के जेल में रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है, जबकि अभियोजन पक्ष इन्हें दंगों का मास्टरमाइंड बताकर रिहाई का कड़ा विरोध कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने से पहले इन सभी आरोपियों ने निचली अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है, लेकिन अब तक उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है। दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की गंभीरता को देखते हुए बार-बार उनकी याचिकाएं खारिज कीं। इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा, जहाँ 2 सितंबर 2025 को उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि प्रथम दृष्टया इन आरोपियों के खिलाफ साजिश के साक्ष्य मौजूद हैं। हाईकोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों (बचाव पक्ष और दिल्ली पुलिस) की मैराथन दलीलें सुनने के बाद 10 दिसंबर 2025 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट को बताया कि चार्जशीट हजारों पन्नों की है और ट्रायल शुरू होने में अभी काफी समय लग सकता है, ऐसे में अनिश्चित काल तक जेल में रखना उचित नहीं है। वहीं, सॉलिसिटर जनरल ने दंगों की विभीषिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब करने की साजिश का हवाला दिया। अब जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच इस पर अंतिम निर्णय सुनाएगी, जिसका इंतजार पूरा देश कर रहा है।
फरवरी 2020 में संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के विरोध के दौरान दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में भीषण हिंसा भड़की थी, जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इसे एक ‘बड़ी साजिश’ (Case 59/2020) करार दिया था। आज की सुनवाई इस मायने में अहम है कि कोर्ट यह तय करेगा कि क्या ‘ट्रायल में देरी’ को आधार बनाकर यूएपीए के तहत बंद आरोपियों को राहत दी जा सकती है या नहीं। यदि सुप्रीम कोर्ट जमानत देता है, तो यह यूएपीए मामलों में एक बड़ा न्यायिक मिसाल (Precedent) साबित होगा।
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