संसद के आगामी सत्र से पहले डीलिमिटेशन बिल को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सर्वदलीय बैठक में हुई चर्चाओं के बाद अब सभी की नजर डीएमके और एमके स्टालिन के अगले रुख पर है। आखिर अंदरखाने क्या रणनीति बनी, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी।
संसद के आगामी सत्र से पहले डीलिमिटेशन बिल को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सर्वदलीय बैठक में हुई चर्चाओं के बाद अब सभी की नजर डीएमके और एमके स्टालिन के अगले रुख पर है। आखिर अंदरखाने क्या रणनीति बनी, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी।

Delimitation Bill: संसद के मानसून सत्र के शुभारंभ से पूर्व बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में परिसीमन (डीलिमिटेशन) विधेयक को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया। इस बैठक में डीएमके के रुख को लेकर राजनीतिक गलियारों में विभिन्न कयास लगाए जा रहे थे। आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने दावा किया था कि डीएमके ने परिसीमन बिल का समर्थन करने का संकेत दिया है। हालांकि, स्थिति को स्पष्ट करते हुए डीएमके के वरिष्ठ सांसद तिरुची शिवा ने खंडन किया और कहा कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस विषय पर कोई औपचारिक या स्पष्ट प्रस्ताव सदन या सर्वदलीय पटल पर नहीं रखा है। डीएमके का मानना है कि जब तक सरकार अपनी मंशा और प्रस्ताव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।


बैठक के दौरान महिला आरक्षण विधेयक को लेकर डीएमके ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। पार्टी का स्पष्ट कहना है कि महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। डीएमके की मांग है कि इसे मौजूदा लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर ही धरातल पर उतारा जाए। पार्टी ने इस बात पर जोर दिया है कि महिला आरक्षण को परिसीमन की जटिल और लंबी प्रक्रिया के साथ जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इससे आरक्षण के लाभ मिलने में अनावश्यक देरी हो सकती है। डीएमके यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश की आधी आबादी को उनके हक का प्रतिनिधित्व बिना किसी देरी के प्राप्त हो।

डीएमके ने एक बार फिर दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि नए परिसीमन बिल में दक्षिण भारत की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व से कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। डीएमके के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि नया परिसीमन दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्ति को कम करता है या उनकी हिस्सेदारी को प्रभावित करता है, तो इस प्रक्रिया को अगले 25 वर्षों के लिए फ्रीज (स्थगित) कर दिया जाना चाहिए। पार्टी के अनुसार, किसी भी राज्य के प्रतिनिधित्व को कम करना संघवाद के ढांचे के खिलाफ होगा।
डीएमके ने बिल को लेकर एक बड़ी शर्त रखते हुए कहा है कि यदि सरकार लोकसभा सीटों की संख्या में 50% की वृद्धि करती है, तो पार्टी इस पर सकारात्मक रुख अपना सकती है। हालांकि, डीएमके चाहती है कि यह आश्वासन केवल मौखिक न रहे, बल्कि इसे विधेयक में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। उल्लेखनीय है कि गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व में लोकसभा में मौखिक रूप से इसके संकेत दिए थे, लेकिन डीएमके अब इसे लिखित कानूनी प्रावधान के रूप में देखना चाहती है।
वर्तमान में, सरकार ने मानसून सत्र के विधायी कार्यों की सूची में परिसीमन बिल को शामिल नहीं किया है। हालांकि, सरकारी सूत्रों का यह दावा है कि जब भी यह विधेयक सदन में पेश किया जाएगा, सरकार के पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद होगा। कुल मिलाकर, परिसीमन का मुद्दा आने वाले दिनों में केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच एक बड़ी सियासी खींचतान का कारण बन सकता है, जहाँ संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती होगा।

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