Abhishek Banerje : कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रमुख सांसद अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर संसदीय क्षेत्र स्थित कार्यालय को ढहाने की चल रही प्रशासनिक कार्रवाई पर महत्वपूर्ण रोक लगा दी है। इस मामले की विशेष सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी ने राज्य प्रशासन को कड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई अथवा जुलाई के अंत तक, जो भी पहले हो, उस समय तक इस पांच मंजिला इमारत पर कोई भी विध्वंसक कार्रवाई न की जाए। यह अंतरिम आदेश ‘लीप्स एंड बाउंड्स प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा दायर की गई एक याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया गया है। अदालत ने भवन परिसर में यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने के निर्देश दिए हैं और यह स्पष्ट किया है कि अब इस मामले की अगली सुनवाई एक नियमित पीठ द्वारा की जाएगी।

दस्तावेजों की लूट और पुलिस की भूमिका पर अदालत ने जताई नाराजगी
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता की उस मांग को तत्काल स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं और असामाजिक तत्वों ने कार्यालय से महत्वपूर्ण दस्तावेज लूट लिए हैं और पुलिस इस पूरी घटना के दौरान मूकदर्शक बनी रही। इस संबंध में न्यायमूर्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में इस बात का कोई ठोस उल्लेख नहीं है कि क्या इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। अदालत का मानना है कि पुलिस के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि के लिए कानूनी रूप से दर्ज शिकायत का प्रमाण आवश्यक है, जिसके अभाव में इस मुद्दे पर तत्काल राहत देना संभव नहीं था।

प्रशासन और सांसद के दावों में फंसी है पांच मंजिला इमारत
दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन ने शनिवार को इस पांच मंजिला इमारत को ढहाने की प्रक्रिया शुरू की थी, प्रशासन का मुख्य तर्क यह है कि उक्त भवन का निर्माण स्वीकृत नक्शे के बिना और निर्माण संबंधी नियमों का उल्लंघन करके किया गया है। इसके विपरीत, अभिषेक बनर्जी का दावा है कि यह भवन उनका संसदीय क्षेत्रीय कार्यालय है, जिसे कानूनी रूप से खरीदी गई भूमि पर सभी आवश्यक सरकारी अनुमतियां प्राप्त करने के बाद ही निर्मित किया गया है। विवाद के केंद्र में स्थित इस भवन की वैधता को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं।
कानूनी बहस: सुनवाई का अवसर और निर्माण की वैधता पर सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर दत्ता ने अदालत में दलील पेश की कि किसी भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से पूर्व याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने और आपत्ति दर्ज कराने का वैधानिक अवसर मिलना चाहिए था, जो उन्हें नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि न तो उन्हें शिकायत की कोई प्रति दी गई और न ही ध्वस्तीकरण के आदेश की कॉपी उपलब्ध कराई गई। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता सुरोजित नाथ मित्रा ने बताया कि नोटिस जारी होने के कारण याचिकाकर्ता को कार्रवाई की पूरी जानकारी थी। महाधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है कि उक्त निर्माण दक्षिण 24 परगना जिला परिषद द्वारा स्वीकृत भवन योजना के अनुरूप ही किया गया था।












