World's smallest snake
World’s smallest snake: छत्तीसगढ़ की जैव विविधता एक बार फिर चर्चा का विषय बनी हुई है। राज्य के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले में दुनिया की सबसे छोटी प्रजाति का दुर्लभ सांप पाया गया है। 19 फरवरी 2026 को हुए इस रेस्क्यू ने न केवल स्थानीय निवासियों को हैरान कर दिया है, बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच भी कौतूहल पैदा कर दिया है। यह नन्हा जीव अपनी अनूठी विशेषताओं और दुर्लभता के कारण पूरे प्रदेश में सुर्खियों में बना हुआ है।
यह हैरतअंगेज घटना पेंड्रा के चौबेपारा इलाके की है। यहाँ रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर, महिपाल कोल के घर में सफाई के दौरान एक माचिस की डिब्बी मिली। जैसे ही उन्होंने डिब्बी को हाथ लगाया, उन्हें भीतर कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ। गौर से देखने पर पता चला कि माचिस की तीलियों के बीच एक बेहद पतला जीव अपनी जीभ लपलपा रहा था। पहले तो महिपाल को लगा कि यह कोई कीड़ा या केंचुआ है, लेकिन बारीकी से देखने पर वह सांप निकला। इसके बाद बिना देरी किए स्नैक कैचर को सूचना दी गई।
सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे स्नैक कैचर द्वारिका कोल ने इस नन्हे जीव का सुरक्षित रेस्क्यू किया। उन्होंने बताया कि स्थानीय भाषा में इसे ‘अधेलुआ सांप’ कहा जाता है। यह सांप इतना छोटा और पतला होता है कि इसे आसानी से एक सिक्के पर लपेटा जा सकता है। यह माचिस की तीली से भी कम मोटाई का होता है और इसकी लंबाई कुछ ही सेंटीमीटर होती है। द्वारिका कोल ने जानकारी दी कि यह सांप पूरी तरह से अंधा (Blind Snake) होता है और प्रकृति में गैर-विषैला होता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रजाति के सांपों को मुख्यतः कैरेबियाई देश के बारबाडोस द्वीप तक ही सीमित माना जाता है। हालांकि, पेंड्रा के वनांचल क्षेत्रों में पिछले कुछ समय में यह प्रजाति 2-3 बार देखी जा चुकी है, जो पर्यावरणविदों के लिए शोध का विषय है। इस सांप को आधिकारिक तौर पर एक अलग प्रजाति के रूप में पहली बार साल 2006 में पहचाना गया था, हालांकि ये हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं। इनके छोटे आकार के कारण इन्हें अक्सर लोग पहचान नहीं पाते और अनजाने में इन्हें नुकसान पहुँचा देते हैं।
यह सांप अपना अधिकांश समय जमीन के नीचे या सड़ी-गली पत्तियों के बीच बिताना पसंद करता है। इनकी मुख्य खुराक चींटियों के अंडे और छोटे लार्वा होते हैं। अपनी शारीरिक संरचना के कारण ये खुदाई करने में माहिर होते हैं। दुर्लभ होने के कारण इन्हें अक्सर विलुप्ति की कगार पर माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों में इनका मिलना यह संकेत देता है कि यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी इन दुर्लभ जीवों के अनुकूल बना हुआ है। शोधकर्ता समय-समय पर इन जीवों का अध्ययन करने के लिए पेंड्रा जैसे इलाकों का रुख करते हैं।
रेस्क्यू के बाद स्नैक कैचर ने इस नन्हे सांप को सुरक्षित रूप से जंगल में छोड़ दिया है। इस तरह के जीवों का मिलना छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपन्नता को दर्शाता है। प्रशासन और स्थानीय लोगों को चाहिए कि वे ऐसे दुर्लभ जीवों को नुकसान न पहुँचाएं और उनके संरक्षण में मदद करें।
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