@thetarget365 डेस्क छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा चलाए जा रहे युक्तियुक्तकरण (Rationalization) की प्रक्रिया इस समय पूरे प्रदेश में विवादों और असंतोष का कारण बन गई है, लेकिन सरगुजा ज़िले की स्थिति कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है। एक ओर जहां प्रशासन इस प्रक्रिया को ‘व्यवस्थित’ बताने की कोशिश कर रहा है, वहीं शिक्षकों के बीच असमंजस, भ्रम और आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है।
प्रदेश के शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी और डीपीआई ऋतुराज रघुवंशी ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि यदि युक्तियुक्तकरण में कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है, तो संबंधित ज़िला शिक्षा अधिकारी (DEO) और संयुक्त संचालक (JD) जिम्मेदार माने जाएंगे। इसके बावजूद सरगुजा में जिस तरह से प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है, उससे खुद अधिकारी कठघरे में खड़े नज़र आ रहे हैं।
हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी पीठ थपथपाने के कुछ ही घंटों बाद डीईओ कार्यालय के एक लिपिक को निलंबित करना पड़ा। इससे साफ है कि अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था।
अभी तक यह तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन शिक्षक अतिशेष (Surplus) की श्रेणी में आता है और कौन नहीं। व्याख्याता संवर्ग में तो हालात और भी गंभीर हैं। पाँच-छह बार अतिशेष की सूची बदली गई, हर बार नए नाम जुड़ते रहे। काउंसलिंग के दिन ही सुबह 11:30 बजे व्हाट्सएप पर सूची जारी हुई और 12 बजे काउंसलिंग शुरू कर दी गई। कुछ शिक्षक उस समय दिल्ली और रायगढ़ जैसे दूरस्थ स्थानों में थे।
इस प्रक्रिया से कई ज्वलंत प्रश्न खड़े हो गए हैं, जो शिक्षा व्यवस्था की जड़ें हिला सकते हैं:
◆ स्कूलों का विलय: विलीन स्कूलों के भवनों का क्या होगा? रसोइया, स्वीपर जैसे कर्मियों का भविष्य अनिश्चित है।
◆ 2 शिक्षक – 6 कक्षाएं: प्राथमिक शालाओं में 2 शिक्षक 5 कक्षाओं और एक बालवाड़ी को कैसे संभालेंगे?
◆ मूल्यांकन व अनुशासन: दो अलग भवनों के संचालन से अनुशासन और प्रबंधन प्रभावित होगा।
◆ गुणवत्ता पर सवाल: विषय-विशेषज्ञ शिक्षक ना होने से माध्यमिक शालाओं की गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित होगी?
◆ अतिशेष निर्धारण की खामियां: सूची निर्माण में बार-बार बदलाव, एकरूपता का अभाव।
◆ प्रक्रिया की पारदर्शिता: दावा-आपत्ति का समुचित मौका नहीं दिया गया। आनन-फानन में सब कुछ निपटाया गया।
◆ सरकारी बनाम निजी स्कूल: निजी स्कूलों में कक्षा-वार शिक्षक होते हैं, तो फिर सरकारी स्कूलों से वही अपेक्षा क्यों नहीं?
◆ निजीकरण की ओर धकेलने की साजिश?: शिक्षक कम करके शिक्षा की गुणवत्ता गिराकर निजी स्कूलों को बढ़ावा देने की कोशिश तो नहीं?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे विवाद पर कोई भी जनप्रतिनिधि खुलकर सामने नहीं आया है। न तो विधायकों ने कुछ कहा और न ही सांसदों ने सवाल उठाए। शिक्षक संगठन भी मौन नजर आ रहे हैं, मानो वे भी किसी दबाव में हों या फिर भरोसा ही उठा गया हो।
सरगुजा में युक्तियुक्तकरण अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई, बल्कि यह शिक्षकों के आत्मसम्मान, भविष्य और पूरे सरकारी शिक्षा तंत्र की साख का सवाल बन चुका है। अगर यही हालात रहे तो आने वाले समय में न केवल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी बल्कि शासन को भी इसका राजनैतिक खामियाजा उठाना पड़ सकता है।
Rupee vs Dollar : भारतीय मुद्रा बाजार के इतिहास में आज का दिन एक काले…
ICSE Result 2026 : काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) ने आज लाखों…
Stock Market Crash : भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए 30 अप्रैल 2026 की…
IPL 2026 Orange Cap : इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के मौजूदा सीजन में जहां एक…
Cyber Crime Bribery : छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा साइबर अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियानों…
London Terror Attack : इंग्लैंड की राजधानी लंदन एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा और आतंक…
This website uses cookies.
View Comments
विकास खंड अंबिकापुर में स्कूल शिक्षा विभाग के दिशा निर्देशों को दर किनार करते हुए परवीक्षा अवधि के सहायक शिक्षिका नीलू तिर्की को अतिशेष बना कर बिना कॉउंसलिंग के हीं अन्य विद्यालय में दावा आपत्ति के बाद भी पदस्थापना आदेश जारी कर दिया गया,
कुछ प्रभारी जों पति पत्नी एक हीं विद्यालय में पदस्थ है किन्तु वेतन अन्य विकासखंड के के अहरण होने के बाद भी अतिशेष नही बनाया गया है दावा आपत्ति में देने के बाद भी कार्य वाही नही किया गया
शिक्षक युक्ति युक्त करण शिक्षा के लिए आवश्यक है किन्तु प्रशासनिक तानाशाही के कारण पुर्ण रूप से सफल नही हो पाया इसके लिए जिला स्तर का कमेटी पुर्ण रूप से जिम्मेदार है कमेटी पर कार्यवाही होना चाहिए