Election commission News: वोटर आईडी में अब ‘मकान नंबर 0′ या ’00’, ‘9999’, ‘77777’ जैसे काल्पनिक पते नहीं दिखेंगे। चुनाव आयोग जल्द ही मतदाता पहचान पत्र में पते की व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। मकान नंबर की अनिवार्यता को खत्म कर, आधार नंबर या वैकल्पिक पहचान को प्राथमिकता दी जा सकती है।
इस कदम की पृष्ठभूमि में कर्नाटक का वह विवाद है, जिसमें सैकड़ों वोटर कार्ड पर मकान नंबर ‘0’ दर्ज था। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को संसद में उठाते हुए चुनाव आयोग पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने दावा किया था कि ये काल्पनिक पते फर्जी वोटिंग का जरिया बन सकते हैं।
चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने 17 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो स्थायी घर नहीं रखते – जैसे कि फुटपाथ, पुलों के नीचे या खुले स्थानों पर रहने वाले लोग। इन लोगों को वोटिंग अधिकार से वंचित न किया जाए, इसके लिए मकान नंबर की जगह ‘0’ या कोई भी काल्पनिक नंबर दर्ज कर दिया जाता है।
हालांकि, इस व्यवस्था से फर्जीवाड़े की आशंका भी पैदा होती है, क्योंकि एक ही नंबर पर दर्ज सैकड़ों मतदाताओं की पहचान मुश्किल हो जाती है।
चुनाव आयोग के मुताबिक, हर राज्य में लाखों वोटर ऐसे हैं, जिनके पते पर मकान नंबर की जगह 0 या अन्य काल्पनिक नंबर दर्ज हैं। अकेले बिहार में ऐसे करीब 2.90 लाख वोटर हैं जिनके पते पर 0, 00 या 000 लिखा है। इसका बड़ा कारण यह है कि कई गांवों में घरों को नंबर देने की व्यवस्था ही नहीं है।
2011 की जनगणना में गांवों में अस्थायी आवासों को भी नंबर दिए गए थे, लेकिन गांव वालों ने ये नंबर अपने घरों पर नहीं लिखे। नतीजतन, बूथ लेवल अधिकारियों को इन नंबरों की पुष्टि में कठिनाई हुई और वोटर लिस्ट में ‘0’ या अन्य नंबर दर्ज कर दिए गए।
अब चुनाव आयोग मकान नंबर की अनिवार्यता खत्म करने पर विचार कर रहा है। इसके स्थान पर आधार से लिंक पता, “केयर ऑफ” सुविधा या अन्य प्रमाणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यूआईडीएआई (आधार प्राधिकरण) के अनुसार, देश में लगभग 12 लाख लोगों के आधार में स्थाई पता नहीं है। ऐसे में हेड ऑफ फैमिली के “केयर ऑफ” पते को ही आधार पर दर्ज किया जाता है।
2011 की जनगणना में यह सामने आया था कि देश में करीब 17 लाख 73 हजार लोग बेघर हैं, जिनमें 9.38 लाख शहरी और 8.34 लाख ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। नागरिक संगठनों का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविकता से काफी कम है।
अब 2027 की जनगणना से यह उम्मीद की जा रही है कि देश में हर नागरिक की आवासीय स्थिति का सही और विस्तृत रिकॉर्ड सामने आएगा, जिससे वोटर लिस्ट में पते की गड़बड़ियों को खत्म किया जा सकेगा।
वोटर आईडी में काल्पनिक मकान नंबरों की जगह वास्तविक या वैकल्पिक पहचान की ओर कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था को और पारदर्शी बनाने की दिशा में अहम पहल है। इससे न सिर्फ फर्जीवाड़ा रुकेगा, बल्कि बेघर और वंचित लोगों को भी पहचान मिलेगी।
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