Elephanta Island: समुद्री इतिहास पर होगी बड़ी स्टडी, IIT खड़गपुर-ASI-मुंबई पोर्ट की साझेदारी

एलिफेंटा द्वीप यानी घारापुरी के इतिहास को समझने के लिए अब बड़ा वैज्ञानिक शोध शुरू हुआ है। IIT खड़गपुर, मुंबई पोर्ट अथॉरिटी और ASI मिलकर अध्ययन करेंगे कि पुराने समय में समुद्र का स्तर, जलवायु और समुद्री व्यापार ने इस द्वीप को कैसे प्रभावित किया।

Elephanta Island : आईआईटी खड़गपुर, मुंबई पोर्ट अथॉरिटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एलिफेंटा द्वीप और भारत के पश्चिमी तट के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए संयुक्त शोध परियोजना शुरू की है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि पुराने समय में जलवायु में आए बदलाव और समुद्र के जलस्तर में उतार-चढ़ाव ने समुद्री व्यापार, तटीय बस्तियों और मानवीय गतिविधियों को किस तरह प्रभावित किया।

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आधुनिक तकनीक से समझा जाएगा पुराना समुद्री इतिहास

आईआईटी खड़गपुर के अनुसार, यह एक बहुविषयक शोध परियोजना है, जिसमें आधुनिक अर्थ-साइंस तकनीकों के साथ पुरातात्विक प्रमाणों का अध्ययन किया जाएगा। शोधकर्ताओं का लक्ष्य शुरुआती ऐतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक समुद्र के जलस्तर, जलवायु परिस्थितियों और समुद्री गतिविधियों में हुए बदलावों की जानकारी जुटाना है। इस परियोजना के लिए मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की है।

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जलवायु और तटीय भूगोल के संबंधों का होगा अध्ययन

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस परियोजना से पर्यावरणीय बदलाव, तटीय भूगोल, प्राचीन मानव बस्तियों और समुद्री व्यापार नेटवर्क के बीच संबंधों को समझने में नई वैज्ञानिक जानकारी मिलेगी। अध्ययन से यह भी पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि प्राकृतिक परिस्थितियों में बदलाव का प्राचीन व्यापारिक केंद्रों और वहां रहने वाले लोगों पर कितना प्रभाव पड़ा था।

भविष्य में समुद्र का बढ़ता जलस्तर चिंता का विषय

जलवायु परिवर्तन के मौजूदा दौर में समुद्र का बढ़ता जलस्तर भी इस शोध को महत्वपूर्ण बनाता है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2100 के अंत तक वैश्विक समुद्र स्तर में करीब 0.4 से 0.8 मीटर तक वृद्धि हो सकती है। पश्चिमी भारत के तट पर यह बढ़ोतरी कुछ परिस्थितियों में एक मीटर तक पहुंच सकती है। इसका असर मुंबई के निचले इलाकों के साथ एलिफेंटा द्वीप पर भी पड़ सकता है।

1500 साल पुरानी गुफाओं के संरक्षण पर भी नजर

एलिफेंटा द्वीप अपनी करीब 1,500 साल पुरानी प्रसिद्ध रॉक-कट गुफाओं के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इन गुफाओं को यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। समुद्र के जलस्तर में भविष्य में होने वाली वृद्धि और तटीय पर्यावरण में बदलाव इन ऐतिहासिक धरोहरों के आसपास के क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

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खुदाई में मिले प्राचीन जल प्रबंधन के प्रमाण

एएसआई के अभिजीत अंबेडकर की निगरानी में हुई हालिया खुदाई ने एलिफेंटा के प्राचीन इतिहास पर महत्वपूर्ण रोशनी डाली है। खुदाई के दौरान करीब 165 वर्ग मीटर क्षेत्रफल और लगभग आठ मीटर गहरे एक आयताकार जलाशय का पता चला। यह जलाशय सीढ़ीनुमा रास्ते से जुड़ा था। इससे संकेत मिलता है कि लगभग 1,500 वर्ष पहले द्वीप पर वर्षा या मीठे पानी को सुरक्षित रखने की विकसित व्यवस्था मौजूद थी।

विदेशी वस्तुओं से समुद्री व्यापार के संकेत मिले

पुरातात्विक खुदाई में बड़े भंडारण जार, इंडो-मेडिटेरेनियन एम्फोरा के टुकड़े, फिरोजी चमक वाले बर्तनों के अवशेष और मेसोपोटामिया के टॉरपीडो जार भी मिले हैं। इन वस्तुओं से संकेत मिलता है कि एलिफेंटा का संबंध दूर-दराज के क्षेत्रों के साथ समुद्री व्यापार से रहा होगा। इससे द्वीप के धार्मिक महत्व के अलावा उसके आर्थिक और व्यापारिक महत्व की भी तस्वीर सामने आती है।

एलिफेंटा केवल धार्मिक स्थल नहीं था

शोधकर्ताओं को पानी में डूबे घाट के ढांचे, ज्वारीय क्षेत्रों में आवासीय गतिविधियों के अवशेष और बंदरगाह से जुड़ी संरचनाओं पर पानी के निशान भी मिले हैं। इन प्रमाणों के आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि एलिफेंटा केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था, बल्कि प्राचीन समुद्री व्यापार नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा भी रहा होगा।

तलछट के नमूनों से खुलेगा जलवायु का रहस्य

आईआईटी खड़गपुर की जियोलॉजी और जियोफिजिक्स विभाग की प्रोफेसर तथा परियोजना की मुख्य जांचकर्ता मेलिंडा बेरा के अनुसार, शोध में आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से प्राचीन मौसम और समुद्र के जलस्तर का पुनर्निर्माण किया जाएगा। इसके लिए एलिफेंटा और पश्चिमी तट के अन्य हिस्सों में कोर ड्रिलिंग कर तलछट के नमूनों का अध्ययन करने की योजना है।

आइसोटोप से मिलेगी प्राचीन पर्यावरण की जानकारी

शोधकर्ता रेडियोकार्बन डेटिंग के अलावा ऑक्सीजन, कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप का इस्तेमाल कर पुराने पर्यावरण और समुद्री परिस्थितियों का अध्ययन करेंगे। वहीं रेडियोजेनिक आइसोटोप विशेषज्ञ प्रोफेसर वी. रविकांत के नेतृत्व में मिट्टी के बर्तनों और जार के स्ट्रॉन्टियम तथा नियोडिमियम आइसोटोप का विश्लेषण भी किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि इन वस्तुओं के निर्माण में इस्तेमाल मिट्टी कहां से लाई गई थी।

प्राचीन व्यापार के अध्ययन के लिए नया रास्ता

प्राचीन व्यापार के विशेषज्ञ और रिसर्च साइंटिस्ट अजय यादव के मुताबिक, एलिफेंटा भारत के पुराने समुद्री व्यापार के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए नई संभावनाएं खोलता है। इस संयुक्त परियोजना से न केवल एलिफेंटा द्वीप के अतीत को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि यह भी पता चल सकेगा कि जलवायु और समुद्र में बदलावों के बीच भारत के प्राचीन समुद्री नेटवर्क किस तरह विकसित और परिवर्तित हुए।

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