Epilepsy Treatment India
Epilepsy Treatment India: मिर्गी मस्तिष्क से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जिसमें दिमाग की विद्युत गतिविधियों में गड़बड़ी होने के कारण व्यक्ति को बार-बार दौरे पड़ते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 1.5 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं। इतनी बड़ी आबादी के प्रभावित होने के बावजूद, चिकित्सा सहायता लेने वालों की संख्या बहुत कम है। विशेष रूप से ग्रामीण और छोटे शहरों में जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और डरावनी मान्यताओं के कारण लोग न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने के बजाय झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं, जो मरीज की स्थिति को और अधिक गंभीर बना देता है।
आकाश हेल्थकेयर के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. मधुकर भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि मिर्गी का दौरा पड़ने का वैज्ञानिक कारण क्या है। उन्होंने बताया कि हमारा मस्तिष्क निरंतर इलेक्ट्रिकल सिग्नल के जरिए शरीर को निर्देश भेजता है। जब ये सिग्नल कुछ समय के लिए असंतुलित या अनियमित हो जाते हैं, तो व्यक्ति का शरीर पर नियंत्रण खो जाता है। इसकी वजह से शरीर में झटके आ सकते हैं, व्यक्ति अचानक गिर सकता है, या कुछ देर के लिए उसकी याददाश्त और होश गायब हो सकते हैं। कुछ दौरे इतने सूक्ष्म होते हैं कि व्यक्ति केवल खाली नजरों से एक ओर देखता रह जाता है, जिसे लोग अक्सर पहचान नहीं पाते।
समाज में व्याप्त गलतफहमियां मिर्गी के इलाज में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। डॉ. मधुकर के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग इसे भूत-प्रेत या किसी ‘ऊपरी साये’ का असर मानते हैं। कुछ लोग इसे संक्रामक बीमारी समझकर मरीज से दूरी बना लेते हैं, जबकि यह छूने से नहीं फैलती। सबसे खतरनाक गलत धारणा यह है कि दौरे के दौरान मरीज के मुंह में चम्मच, कपड़ा या जूता डाल देना चाहिए; ऐसा करना मरीज के दांतों या श्वास नली को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति सही इलाज के साथ पढ़-लिख सकता है, नौकरी कर सकता है और सुखी वैवाहिक जीवन भी जी सकता है।
डॉ. प्रवीण गुप्ता ने मिर्गी की शीघ्र पहचान पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि हर दौरे में शरीर का कांपना या मुंह से झाग आना जरूरी नहीं है। कई बार मरीज का अचानक भ्रमित होना या ध्यान भटकना भी मिर्गी का लक्षण हो सकता है। क्योंकि लोग इसे पहचान नहीं पाते, इसलिए इलाज में देरी होती है। अच्छी बात यह है कि लगभग 70 प्रतिशत मरीजों में केवल नियमित दवाओं के जरिए दौरों को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। इसे डायबिटीज या बीपी की तरह एक लंबी चलने वाली बीमारी मानकर अनुशासन के साथ दवा लेना अनिवार्य है।
उन मरीजों के लिए भी अब चिकित्सा विज्ञान में बेहतर विकल्प मौजूद हैं जिन पर दवाइयां असर नहीं करतीं। इस स्थिति को ‘ड्रग-रेज़िस्टेंट एपिलेप्सी’ कहा जाता है। डॉ. प्रवीण ने बताया कि ऐसे मामलों में आधुनिक सर्जरी और न्यूरो-रोबोटिक तकनीकें बेहद सफल साबित हो रही हैं। भारत में अब ऐसी एडवांस सर्जरी उपलब्ध हैं जिनसे मस्तिष्क के उस छोटे हिस्से को ठीक किया जा सकता है जहाँ से दौरे शुरू होते हैं। ये तकनीकें उन मरीजों के लिए जीवन बदलने वाली साबित हो रही हैं जिन्होंने पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद छोड़ दी थी।
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