Ethanol Policy : इथेनॉल आवंटन को लेकर उपजे एक गंभीर कानूनी विवाद ने अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया है। मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस हालिया फैसले से जुड़ा है, जिसमें तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को ‘वीआईएनपी’ (VINP) नामक एक इथेनॉल निर्माता कंपनी से इथेनॉल का आवंटन बढ़ाने का निर्देश दिया गया था। केंद्र सरकार ने इस आदेश को राष्ट्रीय नीति के लिए हानिकारक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की अवकाश कालीन बेंच के समक्ष तत्काल सुनवाई की मांग की है। भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए दलील दी कि यदि इस फैसले पर रोक नहीं लगाई गई, तो देश की पूरी इथेनॉल आपूर्ति नीति के ध्वस्त होने का खतरा है। उनकी दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर बुधवार को सुनवाई करने का निर्णय लिया है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय का विवादास्पद आदेश
विवाद की शुरुआत तब हुई जब वीआईएनपी कंपनी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। कंपनी का दावा था कि वह इथेनॉल आपूर्ति के सभी मानकों को पूरा करने के बावजूद, तेल कंपनियों द्वारा उनकी खरीद में कटौती का सामना कर रही है। उच्च न्यायालय ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार करते हुए ओएमसी (OMCs) को यह निर्देश दिया कि वे वीआईएनपी से 9.9 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद सुनिश्चित करें। इस कानूनी लड़ाई में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा था। हालांकि, हाई कोर्ट के इस निर्देश ने आवंटन प्रक्रिया में असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है, जिससे सरकार को नीतिगत मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल की अहम दलीलें
सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की बेंच के समक्ष अपनी बात रखते हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने तीन प्रमुख बिंदु उठाए। प्रथम, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक कंपनी का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश की इथेनॉल आपूर्ति नीति से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है। द्वितीय, उन्होंने जानकारी दी कि इथेनॉल आवंटन की मौजूदा प्रक्रिया अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो चुकी है, जिसके तहत 378 आपूर्तिकर्ताओं को 1,050 करोड़ लीटर इथेनॉल आपूर्ति का आवंटन किया गया था और अब तक 680 लीटर की आपूर्ति हो चुकी है। तृतीय, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि न्यायालय के आदेश पर एक कंपनी का आवंटन बढ़ाया जाता है, तो अन्य सभी आपूर्तिकर्ता भी समान दावे पेश करेंगे, जिससे पूरी पारदर्शी प्रक्रिया और सरकार की बनाई गई राष्ट्रीय नीति का ढांचा चरमरा जाएगा।
नीतिगत स्थिरता बनाम न्यायिक हस्तक्षेप की चुनौती
यह मामला नीतिगत निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं और राष्ट्रीय महत्व के आर्थिक मामलों की संवेदनशीलता को उजागर करता है। सरकार का मानना है कि आवंटन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और स्थापित मानकों पर आधारित है, जिसमें किसी एक कंपनी को विशेष लाभ देना अन्य आपूर्तिकर्ताओं के साथ भेदभावपूर्ण होगा। अब सुप्रीम कोर्ट का आगामी निर्णय यह तय करेगा कि क्या उच्च न्यायालय का आदेश कायम रहेगा या सरकार की नीतिगत स्वायत्तता को प्राथमिकता दी जाएगी। इस सुनवाई पर केवल तेल रिफाइनरी कंपनियों की ही नहीं, बल्कि देश के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी बड़ी आपूर्ति शृंखलाओं की भी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इथेनॉल का उत्पादन और वितरण भारत की हरित ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं का एक अभिन्न अंग है।
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