One Nation One Election : भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने महत्वपूर्ण चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रस्ताव की संवैधानिक वैधता यह सुनिश्चित नहीं करती कि उसके प्रावधान वांछनीय या आवश्यक हैं। जस्टिस खन्ना ने अपनी राय में कहा कि यह संविधान संशोधन विधेयक देश के संघीय ढांचे को कमजोर कर सकता है।
पूर्व CJI ने विशेष रूप से चुनाव आयोग को चुनाव टालने का अधिकार देने के प्रावधान पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग को चुनाव स्थगित करने का अधिकार मिल गया, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति पैदा करेगा। इसका मतलब यह होगा कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों का नियंत्रण अपने हाथों में ले सकती है, जो संघीय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
जस्टिस खन्ना ने इतिहास का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा के एक साथ हुए चुनाव केवल संयोग थे, न कि संविधान का कोई आदेश। उन्होंने इस बात को खारिज किया कि एक साथ चुनाव कराना संविधान की मूल भावना का हिस्सा है। भाजपा सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के सामने विचार साझा करने वाले अधिकांश विशेषज्ञों ने विधेयक को पूर्णतः असंवैधानिक मानने से तो इनकार किया, लेकिन इसके प्रावधानों पर गंभीर सवाल जरूर उठाए।
पूर्व CJI संजीव खन्ना से पहले कई अन्य पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी संसदीय समिति के सामने अपनी राय प्रस्तुत की है। इनमें पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस यूयू ललित और पूर्व CJI रंजन गोगोई शामिल हैं। न्यायपालिका के इन वरिष्ठ व्यक्तित्वों की राय इस विधेयक की व्यापक समीक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
वहीं दूसरी ओर, 30 जुलाई को संसद भवन एनेक्सी में हुई JPC की बैठक में आर्थिक विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव को सकारात्मक नजरिए से देखा। 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह और अर्थशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. प्राची मिश्रा ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने को आर्थिक रूप से फायदेमंद बताया।
दोनों विशेषज्ञों के साझा प्रेजेंटेशन के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने से देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 1.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। 2023-24 के आंकड़ों के आधार पर यह वृद्धि लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपए की होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि चुनावों के बाद अधिक खर्च के कारण राजकोषीय घाटा भी करीब 1.3 प्रतिशत बढ़ सकता है। यह मिश्रित तस्वीर दिखाती है कि आर्थिक लाभ के साथ-साथ कुछ चुनौतियां भी हो सकती हैं।
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