वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सांसद अफज़ाल अंसारी नदवी द्वारा रेल मंत्री को लिखे गए पत्र के बाद मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। आखिर पत्र में क्या मांग की गई है और क्यों बढ़ रही है चर्चा, जानिए पूरी खबर।
वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सांसद अफज़ाल अंसारी नदवी द्वारा रेल मंत्री को लिखे गए पत्र के बाद मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। आखिर पत्र में क्या मांग की गई है और क्यों बढ़ रही है चर्चा, जानिए पूरी खबर।

Ganj Shaheeda Masjid : वाराणसी के काशी रेलवे स्टेशन के समीप स्थित ऐतिहासिक ‘गंज शहीदा मस्जिद’ को ढहाने की प्रस्तावित योजना ने नया राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। रामपुर से लोकसभा सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी ने इस मामले में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। अपने पत्र (संदर्भ संख्या MP/LS/DEL/518/2026) में सांसद नदवी ने स्पष्ट किया है कि यह केवल भूमि अधिग्रहण का मामला नहीं है, बल्कि धार्मिक विरासत के संरक्षण, संवैधानिक अधिकारों और कानून के शासन का विषय है। उन्होंने प्रशासन से इस विध्वंस की योजना पर तुरंत रोक लगाने का आग्रह किया है।

सांसद नदवी ने मस्जिद पर चिपकाए गए नोटिस की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, जिस नोटिस के आधार पर कार्रवाई की बात कही जा रही है, वह कानूनी मानकों पर खरा नहीं उतरता। उस नोटिस में न तो कोई तारीख अंकित है, न ही किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर या पदनाम की मुहर है। सांसद का तर्क है कि सदियों पुराने किसी पूजास्थल को प्रभावित करने वाली कोई भी सरकारी कार्रवाई पूरी तरह से पारदर्शी, कानूनी प्रक्रिया के अनुकूल और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। मनमाने तरीके से जारी नोटिस को उन्होंने कानूनी रूप से अमान्य ठहराते हुए इसे अन्यायपूर्ण बताया है।

मस्जिद कमेटी के दावों को उद्धृत करते हुए पत्र में कहा गया है कि गंज शहीदा मस्जिद का अस्तित्व रेलवे के बुनियादी ढांचे के निर्माण से भी सदियों पहले का है। रिकॉर्ड के अनुसार, यह मस्जिद 1883-84 के सेटलमेंट मैप और उससे भी पुराने राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसे हिजरी 1034 यानी 1624-25 ईस्वी का बताया गया है। सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि इतनी पुरानी धार्मिक संरचना को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के हटाया जाना ऐतिहासिक भूल होगी। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद के ऐतिहासिक अस्तित्व के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
रेल प्रशासन द्वारा जिस सिविल सूट नंबर 1174/1991 (अंजुमन इंतजामिया बनाम भारत संघ) का हवाला दिया जा रहा है, उसे सांसद नदवी ने ‘अप्रासंगिक’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पुराना मुकदमा मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर नहीं, बल्कि बगल की किसी जमीन के विवाद से संबंधित था, जो बाद में तकनीकी कारणों से खारिज हो गया था। इसे मस्जिद की कानूनी स्थिति के खिलाफ अंतिम निर्णय के रूप में देखना गलत है। साथ ही, उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 तथा ‘पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act), 1991’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कानून पूजास्थलों के ऐतिहासिक चरित्र को सुरक्षित रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने का अधिकार देते हैं।
अंत में, सांसद नदवी ने कहा कि देश की प्रगति और बुनियादी ढांचे का विकास निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन यह विकास संवैधानिक मूल्यों और ऐतिहासिक तथ्यों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने रेल मंत्री से गंज शहीदा मस्जिद के विध्वंस या किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की अपील की है। उन्होंने मालिकाना हक की स्वतंत्र समीक्षा और निष्पक्ष जांच की मांग की है ताकि विवाद का समाधान कानून के दायरे में रहकर किया जा सके। सांसद की यह मांग विकास बनाम विरासत की बहस को एक नया आयाम दे रही है।


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