Tiger Death Toll in MP
Tiger Death Toll in MP : देश की राजधानी नई दिल्ली से आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में भले ही बाघों की कुल संख्या में भारी उछाल दर्ज किया गया हो, लेकिन पिछले महज 5 महीनों के भीतर 32 बाघों की असमय मौत ने राज्य के वन विभाग की रातों की नींद उड़ा दी है। इन दुखद मामलों में कान्हा नेशनल पार्क में एक बाघिन और उसके चार मासूम शावकों की सामूहिक मौत भी शामिल है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया है। वरिष्ठ वन अधिकारियों ने बताया कि हाल के दिनों में बाघों की अधिकांश मौतें मुख्य अभ्यारण्य क्षेत्रों (कोर जोन) की सीमाओं से बाहर दर्ज की गई हैं। असल में, बाघों की लगातार बढ़ती आबादी अब इंसानी आवासीय भूभागों और कृषि क्षेत्रों से टकरा रही है, जो उनके लिए काल साबित हो रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया से विशेष बातचीत के दौरान वन्यजीव अधिकारियों ने एक महत्वपूर्ण खुलासा किया। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी और अवैध व्यापार गिरोहों से जुड़े पेशेवर शिकारियों के नेटवर्क को तो काफी हद तक नेस्तनाबूद कर दिया गया है, लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या बाघों के आवास (हैबिटेट) की कमी के रूप में सामने आ रही है। नया इलाका नहीं मिल पाने के कारण बाघ अब सुरक्षित जंगलों और राष्ट्रीय अभ्यारण्यों की सीमाओं को लांघकर बाहर निकल रहे हैं। बाहरी क्षेत्रों में जाने पर वे अक्सर मानवीय गतिविधियों के कारण किसी न किसी गंभीर दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में फसलों की रक्षा के लिए अवैध रूप से लगाए गए कच्चे बिजली के तारों के जाल इस समय बाघों के जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं।
साल 2022 में जारी किए गए नवीनतम बाघ अनुमान के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत में मौजूद कुल 3,682 बाघों की आबादी में से अकेले मध्य प्रदेश 785 बाघों का आशियाना है, जिसके कारण इसे ‘टाइगर स्टेट’ का गौरव प्राप्त है। आंकड़ों से पता चलता है कि मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या में पूरे देश में सबसे तीव्र वृद्धि देखी गई है, जो साल 2018 से 2022 के बीच लगभग 49% तक पहुंच गई है। यह दर 24% की राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर से करीब दोगुनी है। हालांकि, बाघों की संख्या में इस अभूतपूर्व बढ़ोतरी के बावजूद उनके रहने के प्राकृतिक आवास और जंगलों का विस्तार उस गति से नहीं हो सका, जिसके चलते यह संकट गहरा गया है।
अधिकारियों ने बाघों की असमय मौतों और उनके जंगलों से बाहर निकलने के पीछे की एक और मुख्य जैविक वजह पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बाघ अत्यधिक क्षेत्रीय (टेरिटोरियल) प्राणी होते हैं। एक वयस्क बाघ अपने इलाके में किसी दूसरे बाघ की मौजूदगी बर्दाश्त नहीं करता। इसके परिणामस्वरूप वे अक्सर अपने ही प्रजाति के अन्य सदस्यों के साथ हिंसक संघर्ष (इंट्रा-स्पेसिफिक फाइट) में आ जाते हैं। इस आपसी वर्चस्व की जंग में जो बाघ कमजोर, बूढ़े या बहुत युवा होते हैं, उन्हें अपनी जान बचाने और नए क्षेत्रों की तलाश में मजबूरन मुख्य अभ्यारण्य से बाहर की ओर पलायन करना पड़ता है, जहां वे खतरों के सीधे संपर्क में आ जाते हैं।
बाघों की सुरक्षा के सामने इस समय दो और चुनौतियां खड़ी हैं। पहली चुनौती ‘कैनाइन डिस्टेंपर’ जैसे बेहद घातक वायरस का संक्रमण है। कान्हा जैसे देश के प्रमुख और प्रतिष्ठित टाइगर रिजर्व में इस जानलेवा वायरस के कारण कई बाघों और उनके शावकों की मौत ने वन विभाग की चिंता को दोगुना कर दिया है। यह वायरस मुख्य रूप से जंगलों के आसपास घूमने वाले आवारा संक्रमित कुत्तों के माध्यम से जंगली जानवरों की आबादी तक पहुंचता है। दूसरी बड़ी चुनौती मानव-वन्यजीव संघर्ष है। इंसानी बस्तियों के बढ़ते अतिक्रमण के कारण बाघ अक्सर भटककर गांवों और खेतों की तरफ चले जाते हैं, जहां उन्हें स्थानीय लोगों द्वारा प्रतिशोध में जहर दिए जाने, या फिर तेज रफ्तार सड़क व रेल हादसों की चपेट में आने जैसी अप्राकृतिक मौतों का सामना करना पड़ता है।
वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस चालू वर्ष में दर्ज की गई बाघों की कुल मौतों में से लगभग 80 फीसदी मौतें पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्रों के बाहर दर्ज की गई हैं। चिंता की बात यह है कि कई बाघों के शव आरक्षित वनों की सीमाओं से कई किलोमीटर दूर खुले मैदानों और खेतों में बरामद किए गए हैं। अपने आवागमन या नए ठिकाने की खोज के दौरान बाघ अक्सर इंसानी गांवों के साथ सीधे आमने-सामने के टकराव की स्थिति में आ जाते हैं। इसके अलावा, उन्हें कृषि क्षेत्रों में भी भारी जोखिम रहता है, जहां किसानों द्वारा जंगली सूअरों और नीलगायों जैसे शाकाहारी जानवरों को अपनी फसलों से दूर रखने या उन्हें मारने के लिए खेतों के चारों ओर अनधिकृत रूप से हाई-वोल्टेज बिजली के तार दौड़ाए जाते हैं, जिनकी चपेट में अनजाने में ये राष्ट्रीय पशु आ जाते हैं।
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