Guru in Horoscope: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में देवताओं के गुरु बृहस्पति को बेहद महत्वपूर्ण, प्रभावशाली और अत्यंत शुभ ग्रह माना गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका विशेष प्रभाव देखा जाता है, विशेष रूप से शादी-विवाह के मामलों में गुरु की स्थिति का मिलान अनिवार्य रूप से किया जाता है। यही कारण है कि जब भी आकाश में गुरु अस्त होते हैं, तो उस अवधि में मांगलिक कार्य और विवाह वर्जित माने जाते हैं। गुरु बृहस्पति को मुख्य रूप से ज्ञान, बुद्धि, उच्च शिक्षा, धन, सौभाग्य, आध्यात्मिकता और विवाह का मुख्य कारक ग्रह माना गया है।

कुंडली में गुरु की स्थिति और उसका प्रभाव
मानव जीवन पर बृहस्पति की स्थिति का गहरा प्रभाव पड़ता है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में गुरु मजबूत और शुभ स्थिति में विराजमान होते हैं, तो व्यक्ति को जीवन में अपार सुख, वैभव, मान-सम्मान और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत, यदि कुंडली में गुरु कमजोर हों, अशुभ स्थानों पर बैठे हों या पीड़ित अवस्था में हों, तो व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह की असफलताओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जीवन में बार-बार उतार-चढ़ाव आते हैं और आर्थिक स्थिति भी कमजोर बनी रहती है।

प्रथम से तृतीय भाव तक गुरु का फल
ज्योतिषीय गणना के अनुसार कुंडली के पहले यानी लग्न भाव में बैठे गुरु को बहुत शुभ फलदायी माना गया है। यहाँ विराजमान गुरु जातक को प्रचुर ज्ञान देते हैं और उसके व्यक्तित्व को बेहद आकर्षक बनाते हैं। ऐसे लोग धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, समाज में इन्हें मान-सम्मान मिलता है और इनकी आयु लंबी होती है। वहीं, जिन लोगों की कुंडली के दूसरे भाव में गुरु होते हैं, वे धनवान बनते हैं और उनकी वाणी बहुत मधुर होती है। तीसरे भाव में बैठे गुरु व्यक्ति को साहसी और पराक्रमी बनाते हैं, हालांकि ऐसे लोगों को सफलता के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
चौथे और पांचवें भाव में बृहस्पति का प्रभाव
कुंडली के चौथे भाव में गुरु का विराजमान होना जातक को भूमि, भवन, वाहन और भौतिक सुखों का प्रचुर आनंद प्रदान करता है। ऐसे जातकों के अपनी माता के साथ संबंध बहुत मधुर और प्रगाढ़ होते हैं। इसके अलावा, जिन लोगों की जन्म कुंडली के पांचवें भाव में गुरु बैठे होते हैं, उन्हें शिक्षा, पठन-पाठन और बौद्धिक कार्यों के क्षेत्र में बेहद शानदार परिणाम हासिल होते हैं। ऐसे लोग अपनी बुद्धि के बल पर जीवन में उच्च पदों को प्राप्त करते हैं और संतान सुख भी उत्तम रहता है।
छठे से नौवें भाव तक गुरु के विभिन्न परिणाम
छठे भाव में विराजमान गुरु जातक को अपने शत्रुओं पर विजय दिलाते हैं, लेकिन इस स्थान पर बैठे गुरु स्वास्थ्य संबंधी और आर्थिक परेशानियों का कारण भी बन सकते हैं। सातवें भाव में बैठे गुरु जातक को एक योग्य, समझदार जीवनसाथी और समाज में बड़ी ख्याति दिलाते हैं। आठवें भाव में गुरु होने पर व्यक्ति की रुचि गूढ़ विषयों, ज्योतिष और रहस्य विज्ञान को जानने में होती है, हालाँकि यह कभी-कभी अचानक धन हानि भी कराते हैं। नौवें भाव में बैठे गुरु जातक के भाग्य को मजबूत करते हैं और करियर में सफलता के नए द्वार खोलते हैं।
दसवें से बारहवें भाव में गुरु की स्थिति
कुंडली के दसवें यानी कर्म भाव में बैठे गुरु जातक को कार्यक्षेत्र में उच्च पद, प्रतिष्ठा और पारिवारिक जीवन में अपार खुशियां प्रदान करते हैं। ग्यारहवें भाव (आय भाव) में बैठे गुरु व्यक्ति को अत्यधिक धनवान और समृद्ध बनाते हैं, जिससे उसके सभी आर्थिक स्रोत मजबूत होते हैं। अंत में, बारहवें भाव में विराजमान गुरु व्यक्ति को बेहद आध्यात्मिक, परोपकारी और दानी प्रवृत्ति का बनाते हैं। ऐसे लोग ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं और अपना जीवन समाज कल्याण के कार्यों में समर्पित कर देते हैं।
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