Himalayan States Crisis: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर हिमालय की गोद में बसे राज्यों, खासकर हिमाचल प्रदेश की नाजुक पारिस्थितिकी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि वर्तमान स्थिति जारी रही, तो हिमाचल प्रदेश भारत के नक्शे से गायब हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “ईश्वर न करे, लेकिन अगर विकास की यही रफ्तार और लापरवाही जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब यह सुंदर पहाड़ी राज्य अस्तित्व के संकट में पड़ जाएगा।”

क्यों जताई गई चिंता?
पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश ने भूस्खलन, बाढ़ और भारी बारिश जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है। हाल ही में आई बाढ़ में 170 से अधिक लोगों की जान चली गई थी, और व्यापक संपत्ति का नुकसान हुआ। कोर्ट ने इस स्थिति के लिए अंधाधुंध निर्माण, असंवेदनशील पर्यटन नीति और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को जिम्मेदार ठहराया।

कोर्ट के तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार से पूछा है कि:राज्य में निर्माण कार्यों की निगरानी कैसे की जा रही है?क्या पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव का आकलन किया गया?पर्यटन के नाम पर हो रहे बेतरतीब विस्तार को कैसे रोका जा रहा है?इन सवालों के जवाब राज्य सरकार को 28 अक्टूबर तक देने होंगे।
केवल राजस्व नहीं, प्रकृति भी ज़रूरी
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल राजस्व वसूली को प्राथमिकता देना सही नहीं है। सरकारों को यह समझना होगा कि अगर प्राकृतिक संतुलन नहीं बचाया गया, तो पर्यटन और विकास दोनों ही अर्थहीन हो जाएंगे।सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “प्राकृतिक आपदाएं अब चेतावनी नहीं, बल्कि परिणाम हैं। मानव गतिविधियों ने हिमालय की सहनशीलता को खतरे में डाल दिया है।”
क्या कहता है पर्यावरणीय डेटा?
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी राज्यों में पिछले दशक में:भूस्खलन की घटनाओं में 50% की वृद्धि हुई है।बर्फबारी में गिरावट और बारिश में अनियमितता देखी गई है।पर्यटन के चलते प्लास्टिक प्रदूषण, वाहन प्रदूषण और सीवरेज समस्याएं बढ़ी हैं।सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी को एक चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों के रूप में देखा जा सकता है। अब ज़रूरत है कि हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी राज्य:ईको-फ्रेंडली नीति अपनाएं।

निर्माण पर सख्त निगरानी रखें। स्थानीय पारिस्थितिकी और जलवायु के अनुकूल योजनाएं लागू करें।सुप्रीम कोर्ट का यह बयान केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवता और पर्यावरण की दृष्टि से एक जरूरी संदेश है। अगर समय रहते चेत नहीं गए, तो हिमाचल जैसे खूबसूरत पहाड़ी राज्य वाकई इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं। अब समय है सतर्क होने का, और विकास के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण की ओर बढ़ने का।
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