Assam Politics
Assam Politics: देश के उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा कथित तौर पर नफरत फैलाने वाले और गैर-जिम्मेदाराना बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में सीधे तौर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, कई वरिष्ठ मंत्रियों और राज्यपालों के मुस्लिम-विरोधी बयानों को आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसे बयान न केवल समाज में वैमनस्य बढ़ाते हैं, बल्कि यह उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियों और पद की शपथ का सीधा उल्लंघन है। शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि वह इस बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करे।
इस कानूनी लड़ाई की अगुवाई देश के 12 प्रतिष्ठित नागरिकों ने की है। याचिकाकर्ताओं में दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता रूप रेखा वर्मा और जॉन दयाल जैसे नाम शामिल हैं। इन लोगों का कहना है कि नफरती भाषण (Hate Speech) अब अपवाद नहीं बल्कि एक नियमित जरिया बन गए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री सरमा और अन्य नेता लगातार मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर ऐसी भाषा का उपयोग कर रहे हैं, जिससे अल्पसंख्यकों के मन में भय का माहौल पैदा हो रहा है।
इस विवाद की गूंज दक्षिण भारत तक भी पहुँची है। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई है। ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि नरसंहार की ओर धकेलने वाले नफरती भाषण देना अब एक सामान्य बात बन गई है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है। उन्होंने हैदराबाद पुलिस कमिश्नर से मांग की है कि कानून के तहत सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि नफरत फैलाने वालों को कड़ा संदेश मिल सके।
कांग्रेस पार्टी ने 8 फरवरी 2026 को एक चौंकाने वाला दावा किया। कांग्रेस के अनुसार, असम बीजेपी के आधिकारिक ‘X’ हैंडल से एक एनिमेटेड वीडियो साझा किया गया था, जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को प्रतीकात्मक रूप से मुसलमानों को गोली मारते हुए दिखाया गया था। कांग्रेस ने इसे अल्पसंख्यकों की टार्गेटेड हत्या को बढ़ावा देने वाला वीडियो करार दिया। भारी विवाद और चौतरफा निंदा के बाद, बीजेपी ने इस वीडियो को अपने हैंडल से हटा लिया है, लेकिन विपक्षी दल इसे ‘पॉइंट-ब्लैंक मर्डर’ की मानसिकता को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं।
यह पहली बार नहीं है जब असम के मुख्यमंत्री अपने बयानों के कारण विवादों में घिरे हों। हाल ही में 27 जनवरी को उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि राज्य में जारी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के जरिए मतदाता सूची से 4 से 5 लाख ‘मियां’ मतदाताओं के नाम हटा दिए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे और उनकी पार्टी सीधे तौर पर ‘मियां’ समुदाय के खिलाफ हैं। सरमा ने लोगों से इस समुदाय को परेशान करने तक की अपील की थी, ताकि वे असम छोड़ने पर मजबूर हो जाएं। उनके इन बयानों को मानवाधिकारों और चुनावी शुचिता के खिलाफ माना जा रहा है।
उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली बयानबाजी अब न्यायपालिका की दहलीज पर है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह तय करेगी कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘संवैधानिक मर्यादा’ के बीच की रेखा क्या है। क्या नफरत फैलाने वाले बयानों पर अब कानूनी लगाम लगेगी? फिलहाल, असम से लेकर हैदराबाद तक इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान चरम पर है।
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