राजनीति

Punjab Big Bash: एच.एस. फुल्का ने थामा बीजेपी का हाथ, 2027 चुनाव से पहले पंजाब में मची हलचल

Punjab Big Bash:  पंजाब के राजनीतिक समीकरणों में बुधवार को एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला। आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व कद्दावर नेता और सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। लगभग सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सक्रिय राजनीति में उनकी यह वापसी न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि इसे पंजाब में भाजपा की जड़ों को मजबूत करने वाले एक बड़े “बूस्ट” के तौर पर देखा जा रहा है। फुल्का का भाजपा में शामिल होना राज्य की आगामी राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, खासकर सिख समुदाय के बीच पार्टी की पैठ को लेकर।

1984 के दंगों के पीड़ितों के मसीहा की नई पारी

एच.एस. फुल्का केवल एक राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि एक प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने दशकों तक 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी है। पीड़ितों के पक्ष में उनकी अटूट निष्ठा और कानूनी विशेषज्ञता के कारण पंजाब और सिख समुदाय में उनका गहरा सम्मान है। भाजपा में उनके प्रवेश को इसी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे पार्टी को सिख वोटों को साधने में मदद मिल सकती है।

पार्टी मुख्यालय में भव्य स्वागत और शामिल होने की प्रक्रिया

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में आयोजित एक औपचारिक कार्यक्रम के दौरान फुल्का ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पंजाब भाजपा अध्यक्ष सुनील जाखड़, दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ जैसे दिग्गज नेता मौजूद रहे। फुल्का, जो पहले दाखा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं, का स्वागत करते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि उनके आने से पार्टी के नैतिक और रणनीतिक बल में भारी वृद्धि हुई है।

आम आदमी पार्टी के साथ राजनीतिक सफर और चुनौतियां

एच.एस. फुल्का ने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत साल 2014 में आम आदमी पार्टी के साथ की थी। उन्होंने लुधियाना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, जहाँ वे कांग्रेस के रवनीत सिंह बिट्टू से बेहद कम अंतर से हार गए थे। हालांकि, 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी ताकत दिखाई और दाखा निर्वाचन क्षेत्र से शिरोमणि अकाली दल के मनप्रीत सिंह अयाली को हराकर शानदार जीत दर्ज की। उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी।

सिद्धांतों के लिए त्याग और ‘आप’ से दूरी

फुल्का हमेशा से अपनी बेबाकी और सिद्धांतों के लिए जाने जाते रहे हैं। साल 2018 में जब पंजाब की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 2015 के बेअदबी मामलों में ठोस कार्रवाई नहीं की, तो उन्होंने विरोध स्वरूप अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि उन्होंने बाद में आम आदमी पार्टी से भी किनारा कर लिया। राजनीति से दूर रहकर उन्होंने फिर से अपना ध्यान पूरी तरह से कानूनी और सामाजिक कार्यों पर केंद्रित कर दिया था।

अकाली दल से संक्षिप्त जुड़ाव और अब भाजपा की राह

दिसंबर 2024 के दौरान फुल्का के शिरोमणि अकाली दल (SAD) के करीब आने की खबरें भी चर्चा में रहीं। उस समय अकाल तख्त के निर्देश पर अकाली दल के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी और फुल्का उसमें एक सलाहकार या मार्गदर्शक की भूमिका में नजर आए थे। हालांकि, अब भाजपा में शामिल होकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के माध्यम से पंजाब की सेवा करना चाहते हैं। भाजपा के लिए फुल्का जैसे कद्दावर चेहरे का साथ मिलना पंजाब विधानसभा और आगामी चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि फुल्का की यह नई पारी पंजाब की राजनीति में क्या बदलाव लाती है।

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