Shiv Sena on GST : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया राष्ट्र के नाम संबोधन में GST सुधारों को लेकर की गई बातों पर विपक्ष के तीखे सवाल जारी हैं। अब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के नेता आनंद दुबे ने केंद्र सरकार को घेरते हुए पूछा है कि अगर यह नया GST इतना अच्छा है, तो क्या इसका मतलब है कि पिछले 7-8 सालों तक जो GST व्यवस्था लागू रही, वह गलत या अनुपयुक्त थी?

“PM मोदी ने कुछ भी नया नहीं कहा”
आनंद दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण में कोई ठोस नई बात नहीं थी, बल्कि वही पुराने वादे, आंकड़ों की बाजीगरी और आत्मप्रशंसा दोहराई गई। उन्होंने कहा कि यदि आज सरकार यह कह रही है कि नया GST सरल, सहज और जनहितैषी है, तो यह स्वीकृति है कि पहले का GST व्यवस्था दोषपूर्ण थी। “नया GST अच्छा तो फिर क्या पहले वाला खराब था? ये तो खुद सरकार की नीतियों पर ही सवाल उठता है,” – आनंद दुबे

7-8 साल की जनता की परेशानी का कौन जिम्मेदार?
दुबे ने कहा कि 2017 में GST लागू होने के बाद से देश के छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग कई समस्याओं से जूझते रहे। विभिन्न वस्तुओं पर लगाए गए बहु-स्तरीय टैक्स स्लैब, जटिल रिटर्न फॉर्म और असमान दरों ने लोगों को उलझन में डाल दिया। उन्होंने पूछा कि अगर सरकार अब जाकर GST को सरल बनाने की बात कर रही है, तो बीते वर्षों में जनता की परेशानी का जिम्मेदार कौन है? क्या सरकार इस विफलता की ज़िम्मेदारी लेगी?
“गब्बर सिंह टैक्स” से लेकर “बचत उत्सव” तक
शिवसेना नेता ने यह भी कहा कि खुद प्रधानमंत्री मोदी की सरकार में ही GST को लेकर भ्रम और विरोधाभास रहा है। पहले जब विपक्ष ने इसे “गब्बर सिंह टैक्स” कहा था, तो सरकार ने उस आलोचना को खारिज कर दिया था। लेकिन अब जब चुनाव नज़दीक हैं, तो “बचत उत्सव” और “सुधारों की बात” करके सरकार जनता को बहलाने का प्रयास कर रही है।
केवल चुनावी लॉलीपॉप?
दुबे ने कहा कि इस प्रकार के भाषणों का साफ संकेत चुनावी रणनीति से जुड़ा है। जनता को राहत देने के नाम पर नई घोषणाएं की जा रही हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी वैसी ही है। व्यापारी वर्ग, नौकरीपेशा और छोटे उद्यमी अभी भी टैक्स की जटिलताओं से जूझ रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बाद GST पर शुरू हुई सियासी बहस अब और तेज़ हो गई है। शिवसेना (UBT) समेत विपक्ष के अन्य दल यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर अब GST को बेहतर किया जा रहा है, तो क्या सरकार पिछले कई वर्षों की खामियों को स्वीकार कर रही है? और अगर हां, तो इसका राजनीतिक और आर्थिक जवाबदेही कौन लेगा?











