Gyanesh Kumar CEC:
Gyanesh Kumar CEC: भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए विपक्षी सांसदों ने संसद में औपचारिक नोटिस दिया है। लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने एकजुट होकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन पर ‘साबित कदाचार’ और सरकार के पक्ष में काम करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्ष ने 12 मार्च को दोनों सदनों में यह नोटिस जमा किया, जिसमें मांग की गई है कि चुनावी निष्पक्षता को बचाने के लिए उन्हें तुरंत हटाया जाए।
विपक्षी दलों द्वारा सौंपे गए नोटिस में ज्ञानेश कुमार पर मुख्य रूप से 7 आरोप लगाए गए हैं। सांसदों का तर्क है कि चुनाव आयोग, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था होनी चाहिए, वह अब केवल कार्यपालिका के राजनीतिक एजेंडे को लागू करने वाला एक ‘माध्यम’ बनकर रह गई है। आरोपों में उनकी विवादास्पद नियुक्ति प्रक्रिया, राहुल गांधी के खिलाफ कथित तौर पर पक्षपातपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस, सत्ताधारी दल के सदस्यों को अनुचित लाभ पहुँचाना और विपक्ष के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार जैसे बिंदु शामिल हैं। साथ ही, उन पर जांच में बाधा डालने और पारदर्शिता के साधनों को जानबूझकर नजरअंदाज करने का भी दोष लगाया गया है।
नोटिस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया से संबंधित है। विपक्ष का आरोप है कि बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक 5 महीने पहले इस जटिल प्रक्रिया को थोपा गया, जिससे समाज के सबसे कमजोर तबकों के लगभग 65 लाख मतदाता वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए। यही मॉडल पश्चिम बंगाल में भी दोहराया गया, जहाँ ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल्स के अनुसार 7.66 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 58 लाख नाम हटा दिए गए। विपक्ष का दावा है कि इस ‘बिहार मॉडल’ का उद्देश्य चुनाव से पहले मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को अनिश्चितता में डालना था।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय और तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं। नोटिस में उल्लेख किया गया है कि फरवरी 2025 में उनकी नियुक्ति जिस ‘आधी रात वाली जल्दबाजी’ में की गई, वह सरकार की मंशा पर शक पैदा करती है। यह मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। इसके अलावा, कर्नाटक के अलंद में मतदाता सूची में धोखाधड़ी, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट और मतदान केंद्रों के CCTV फुटेज देने से इनकार करने जैसे आरोपों ने चुनाव आयोग की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विपक्ष का कहना है कि आयोग अब एक अपारदर्शी संस्था बन चुका है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बनी, तो मानसून सत्र के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ औपचारिक महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। नियम के अनुसार, महाभियोग प्रस्ताव लाने से 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य होता है, जिसे विपक्ष ने पूरा कर लिया है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में किसी CEC के खिलाफ सबसे बड़ी संवैधानिक कार्रवाई होगी। फिलहाल, पूरे देश की नजरें संसद की आगामी कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं।
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