SC Netaji Petition
SC Netaji Petition : भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने एक याचिकाकर्ता को न केवल जमकर फटकार लगाई, बल्कि भविष्य के लिए एक ऐसी चेतावनी भी दी जो कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का समय प्रचार पाने के हथकंडों के लिए नहीं है और बार-बार एक ही तरह के मुद्दे उठाकर अदालत का कीमती समय बर्बाद करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
यह पूरा मामला पिनाकपानी मोहंते द्वारा दायर की गई एक याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आधिकारिक तौर पर ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित किया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया था कि भारत सरकार को यह घोषणा करनी चाहिए कि 1947 में मिली आजादी का मुख्य कारण नेताजी और उनकी आजाद हिंद फौज (INA) द्वारा किया गया सशस्त्र संघर्ष था। मोहंते चाहते थे कि अदालत संबंधित विभागों को इस दिशा में कड़े निर्देश जारी करे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने जब यह मामला आया, तो सीजेआई का पारा चढ़ गया। उन्हें जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता मोहंते इससे पहले भी ठीक इसी विषय पर दो बार याचिकाएं दाखिल कर चुके थे, जिन्हें कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका था। याचिकाकर्ता की पुनरावृत्ति पर भड़कते हुए सीजेआई ने कहा, “प्रचार पाने के लिए अदालत का इस्तेमाल न करें। हम रजिस्ट्री को निर्देश दे रहे हैं कि भविष्य में आपकी कोई भी जनहित याचिका स्वीकार न की जाए।” जब मोहंते ने दलील देने की कोशिश की, तो सीजेआई ने सख्त लहजे में कहा कि “अब तुम्हारी सुप्रीम कोर्ट में एंट्री ही बंद कर देंगे।”
याचिका में केवल उपाधि की मांग ही नहीं थी, बल्कि कुछ ऐतिहासिक बदलावों की भी अपील की गई थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि नेताजी के जन्मदिन (23 जनवरी) और आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस (21 अक्टूबर) को ‘नेशनल डे’ (राष्ट्रीय दिवस) के रूप में घोषित किया जाए। इसके अतिरिक्त, याचिका में केंद्र सरकार को 1947 की आजादी पर एक ‘वास्तविक रिपोर्ट’ सार्वजनिक करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें उन कारणों का विस्तृत उल्लेख हो जिनके दबाव में अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई बार स्पष्ट किया है कि किसी महापुरुष को विशेष उपाधि देना या ऐतिहासिक घटनाओं का पुनर्मूल्यांकन करना सरकार का नीतिगत फैसला होता है, न कि अदालत का। सीजेआई की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि बार-बार एक ही मांग को अलग-अलग तरीके से पेश कर कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा था। बेंच ने माना कि इस तरह की याचिकाएं केवल सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से दायर की जाती हैं, जिससे वास्तविक और गंभीर मामलों की सुनवाई में देरी होती है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर जनहित याचिकाओं (PIL) के बढ़ते दुरुपयोग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो वैचारिक या ऐतिहासिक मुद्दों को अदालती आदेश के जरिए मनवाना चाहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं हैं और महापुरुषों का सम्मान हृदय में होता है, उसे अदालती डिक्री के जरिए थोपा नहीं जा सकता। फिलहाल, कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के भविष्य के कानूनी प्रयासों पर भी अंकुश लगा दिया है।
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