अंतरराष्ट्रीय

India EU FTA 2026: व्यापार समझौतों में भारत ने अमेरिका को पछाड़ा, ट्रंप की टैरिफ नीतियां हुई विफल

India EU FTA 2026: विश्व व्यापार के बदलते समीकरणों के बीच भारत ने एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया है। वैश्विक व्यापार समझौतों की दौड़ में भारत अब अमेरिका से कहीं आगे निकल गया है। ‘वेदा पार्टनर्स’ की हालिया रिपोर्ट ने वॉशिंगटन के नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियां न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द साबित हो रही हैं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक साख ने अमेरिका के वर्चस्व को सीधी चुनौती दी है।

ट्रंप की टैरिफ रणनीति का फ्लॉप शो

वेदा पार्टनर्स की सह-संस्थापक हेनरीटा ट्रेज ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि ट्रंप प्रशासन की टैरिफ वाली रणनीति का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिला है। वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि भारत ने इस वर्ष व्यापारिक समझौतों के मामले में अमेरिका से 100 फीसदी बेहतर प्रदर्शन किया है। जहाँ भारत एक के बाद एक महत्वपूर्ण वैश्विक डील साइन कर रहा है, वहीं अमेरिका की व्यापारिक नीतियां कागजों तक ही सीमित रह गई हैं। यह स्थिति अमेरिकी प्रशासन के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई है।

90 दिन में 90 समझौते: एक अधूरा वादा

डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद 90 दिनों के भीतर 90 व्यापार समझौते करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था। हालांकि, वास्तविकता इसके ठीक उलट है। पिछले 10 महीनों के कार्यकाल में अमेरिका केवल कंबोडिया और मलेशिया के साथ दो मामूली सौदे करने में ही सफल रहा है। अमेरिकी सांसदों के बीच निराशा बढ़ रही है क्योंकि सरकार की आक्रामक बयानबाजी अब तक किसी ठोस आर्थिक लाभ में तब्दील नहीं हो पाई है। भारत की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और लचीली व्यापारिक नीतियों ने उसे वैश्विक निवेशकों की पहली पसंद बना दिया है।

बड़े साझेदारों के साथ टूटता भरोसा

एक समय था जब दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका का 96 फीसदी व्यापार ‘मुक्त व्यापार समझौते’ (FTA) के तहत होता था और टैरिफ शून्य थे। अब टैरिफ को दबाव के रूप में इस्तेमाल करने की नीति यूरोपीय संघ (EU), जापान और दक्षिण कोरिया जैसे पुराने सहयोगियों पर बेअसर साबित हो रही है। दक्षिण कोरिया के साथ होने वाली महत्वपूर्ण ट्रेड डील का रुक जाना अमेरिका के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका है। साझेदार देशों को लगता है कि अमेरिका की वर्तमान नीतियां ‘सिर्फ अपना फायदा’ देखने वाली हैं, जिसके कारण वे अब भारत जैसे विश्वसनीय विकल्पों की ओर देख रहे हैं।

अमेरिका के भीतर बढ़ता जनविरोध और दबाव

केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर भी टैरिफ नीतियों के खिलाफ गुस्सा फूट रहा है। एक सर्वे के मुताबिक, 50 फीसदी अमेरिकी नागरिक चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इन टैरिफ नीतियों को तुरंत रद्द कर दे। इस जनविरोध ने व्हाइट हाउस के आर्थिक एजेंडे को कमजोर कर दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप पर अब अपने वोटरों का भरोसा बचाने का भारी दबाव है, क्योंकि रुकी हुई व्यापारिक वृद्धि के कारण उनकी और रिपब्लिकन पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है।

भारत की बढ़ती साख और अमेरिका की साख पर संकट

आज भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि एक स्थिर और प्रगतिशील व्यापारिक भागीदार भी है। ‘अमेरिका के साथ व्यापार करो’ (Sell with America) जैसी नीतियों के बावजूद, अमेरिकी प्रशासन वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। व्यापारिक गतिरोध के कारण अमेरिका की वैश्विक साख दांव पर लगी है, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित ट्रेड पॉलिसी के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का नया ‘पॉवरहाउस’ बनकर उभरा है।

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