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LPG Crisis in India: 10 साल में दोगुनी हुई गैस की खपत लेकिन उत्पादन सुस्त, क्या भारी आयात निर्भरता देश के लिए बन रही है खतरा?

LPG Crisis in India: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चूलें हिला दी हैं। इस युद्ध का सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव अब भारत की रसोई तक पहुँच चुका है। देश के कई प्रमुख शहरों में एलपीजी (LPG) गैस की किल्लत की खबरें आ रही हैं, जिसके चलते गैस एजेंसियों के बाहर उपभोक्ताओं की लंबी कतारें लग गई हैं। सबसे ज्यादा प्रभाव उन छात्रों और कामकाजी लोगों पर पड़ रहा है जो लॉज या मेस में रहते हैं। गैस की कमी के कारण कई रेस्टोरेंट्स ने अपना मेन्यू सीमित कर दिया है, वहीं ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोग एक बार फिर खाना पकाने के लिए पारंपरिक लकड़ी और चूल्हे का सहारा लेने पर मजबूर हो गए हैं।

संसद में हंगामा और सरकार का आधिकारिक पक्ष

एलपीजी की आपूर्ति में आ रही बाधा को लेकर देश में राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन करते हुए इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार आपूर्ति श्रृंखला को संभालने में विफल रही है। हालांकि, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप पुरी ने 12 मार्च को लोकसभा में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि देश में पेट्रोल, डीजल और केरोसिन का पर्याप्त भंडार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एलपीजी की सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है और बाजार में जो अफरा-तफरी दिख रही है, वह केवल ‘पैनिक बुकिंग’ के कारण है। मंत्री के अनुसार, उपभोक्ता भविष्य की चिंता में जरूरत से ज्यादा बुकिंग कर रहे हैं, जिससे कृत्रिम किल्लत पैदा हो रही है।

भारत में एलपीजी की बढ़ती मांग और उज्ज्वला योजना का प्रभाव

पिछले एक दशक के आंकड़े बताते हैं कि भारत में एलपीजी की खपत में 60% की भारी वृद्धि हुई है। वर्ष 2015-16 में जहाँ खपत 19.6 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) थी, वहीं अब इसके 31.3 MMT तक पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि का एक मुख्य कारण प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना है, जिसके तहत 10.33 करोड़ से अधिक नए कनेक्शन दिए गए हैं। हालांकि इस योजना ने स्वच्छ ईंधन को घर-घर पहुँचाया है, लेकिन इसने अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता को भी बढ़ा दिया है।

घरेलू उत्पादन की सीमाएं और आयात पर बढ़ती निर्भरता

भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बढ़ती खपत के मुकाबले घरेलू उत्पादन स्थिर बना हुआ है। वर्तमान में भारत अपनी कुल जरूरत का केवल 41% हिस्सा ही खुद पैदा कर पाता है, जबकि शेष 59% से 60% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। पिछले आठ वर्षों से घरेलू उत्पादन लगभग 12 MMT के आसपास ही अटका हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि 2015-16 में घरेलू उत्पादन कुल खपत का 54% था, जो अब घटकर काफी नीचे आ गया है। इसने भारत को अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक अस्थिरता के सामने कमजोर कर दिया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य: भारत की ‘एनर्जी लाइफलाइन’ और सुरक्षा जोखिम

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और हमारे कुल आयात का लगभग 85% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका-इजरायल संघर्ष का केंद्र यही क्षेत्र है। भारत अपनी 80% पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति खाड़ी देशों से करता है, जिसमें कतर (33%), यूएई (27%) और अमेरिका (8.6%) प्रमुख हैं। यदि इस समुद्री मार्ग पर युद्ध के कारण कोई बड़ी रुकावट आती है, तो भारत की पूरी ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

सीमित भंडारण क्षमता और भविष्य की रणनीतिक चुनौतियां

भारत में एलपीजी के आपातकालीन भंडारण की स्थिति भी काफी चिंताजनक है। अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास केवल 18 दिनों का बफर स्टॉक उपलब्ध है। इसमें क्षेत्रीय असंतुलन भी है; उत्तर भारत में केवल 8 दिन का भंडारण है, जबकि पश्चिम और दक्षिण भारत में यह क्षमता क्रमशः 26 और 23 दिन की है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों और रणनीतिक भंडारण क्षमता (Strategic Storage) को तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है।

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