Indore Water Tragedy
Indore Water Tragedy: देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल करने वाले इंदौर से एक विचलित करने वाली सच्चाई सामने आई है। नगर निगम द्वारा स्वच्छता और जल प्रबंधन के नाम पर पिछले चार वर्षों में ₹8,000 करोड़ जैसी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बावजूद, शहरवासियों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो रहा है। भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से अब तक 21 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 3,300 से अधिक लोग गंभीर रूप से बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हैं। यह संकट तब और गहरा हो जाता है जब हम देखते हैं कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में ही निगम ने इस मद में ₹2,450 करोड़ खर्च करने का विशाल लक्ष्य रखा है।
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को एमवाय अस्पताल में उपचाराधीन 50 वर्षीय सुनीता वर्मा ने दम तोड़ दिया, जिससे मृतकों की कुल संख्या बढ़कर 21 हो गई है। सुनीता को 6 जनवरी को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद अस्पताल लाया गया था। परिजनों का आरोप है कि जल आपूर्ति प्रणाली में व्याप्त खामियों की वजह से पूरा मोहल्ला महामारी की चपेट में है। इतनी मौतों के बाद भी प्रशासनिक मशीनरी केवल फाइलों में आंकड़ों का खेल खेल रही है, जबकि जमीन पर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।
नगर निगम जल आपूर्ति और इसके प्रबंधन पर प्रतिवर्ष औसतन ₹250 करोड़ खर्च करता है। इसमें नर्मदा पाइपलाइन के लीकेज सुधार, बोरिंग मेंटेनेंस और जलूद पंपिंग स्टेशन का विद्युत खर्च शामिल है। पड़ताल में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि शहर की 105 टंकियों में पानी की गुणवत्ता तो बेहतर रहती है, लेकिन पाइपलाइन के जरिए घरों तक पहुँचते ही यह दूषित हो जाता है। टंकियों से मात्र 500 मीटर की दूरी तय करते ही पानी पीने लायक नहीं रहता। इसका मुख्य कारण पेयजल पाइपलाइन और ड्रेनेज लाइन का आपस में मिलना है।
इंदौर में लगभग 3,000 किलोमीटर की नर्मदा पाइपलाइन और 2,200 किलोमीटर की सीवरेज लाइन बिछी हुई है। समस्या यह है कि सीवरेज के चैंबर और पाइपलाइन अक्सर चोक रहते हैं। जब ये ड्रेनेज लाइनें ओवरफ्लो होती हैं, तो इनका गंदा पानी नर्मदा की पेयजल पाइपलाइनों में रिसने लगता है। निगम ड्रेनेज मेंटेनेंस पर सालाना ₹50 करोड़ और नए निर्माण पर ₹50 करोड़ खर्च कर रहा है, फिर भी ‘इंदौर 311’ ऐप पर आने वाली शिकायतों में सबसे ज्यादा संख्या चोक ड्रेनेज चैंबरों की ही होती है।
शहर में जल आपूर्ति को सुचारू रखने के लिए भारी भरकम निवेश किया जाता है:
₹225 करोड़: जलूद पंपिंग स्टेशन के संचालन और बिजली बिल पर।
₹25 करोड़: शहर के भीतर नर्मदा पाइपलाइन के रखरखाव पर।
₹25 करोड़: नई टंकियों और वितरण नेटवर्क के विस्तार पर।
₹7 करोड़: जलूद में वॉटर ट्रीटमेंट और मुख्य लाइन के मेंटेनेंस पर।
₹4 करोड़: सार्वजनिक बोरिंग के सुधार कार्य पर। इतनी बड़ी धनराशि के बावजूद नागरिकों को उपचार के लिए निजी अस्पतालों में अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करनी पड़ रही है।
इंदौर की स्वच्छता रैंकिंग और जमीनी हकीकत के बीच का यह विरोधाभास डरावना है। यदि नगर निगम ड्रेनेज शिकायतों पर समय रहते ठोस कार्रवाई करे और पाइपलाइनों के लीकेज को स्थायी रूप से ठीक करे, तो मासूम जिंदगियों को बचाया जा सकता है। वर्तमान में प्रतिदिन 200 चैंबरों की सफाई का दावा किया जाता है, लेकिन भागीरथपुरा जैसे क्षेत्रों की स्थिति इन दावों की पोल खोलती है। अब देखना होगा कि क्या प्रशासन इस जन स्वास्थ्य आपदा से कोई सबक लेता है या फिर स्वच्छता के पुरस्कारों के पीछे ये मौतें दबकर रह जाएंगी।
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