अंतरराष्ट्रीय

Strait of Hormuz Crisis : ईरान-इजरायल युद्ध से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरा, चीन की सक्रियता से बढ़ा तेल संकट

Strait of Hormuz Crisis : मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को दांव पर लगा दिया है, बल्कि एक गंभीर वैश्विक भू-राजनीतिक संकट को भी जन्म दिया है। रक्षा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस युद्ध की आड़ में चीन एक बड़ी रणनीतिक चाल चलने की फिराक में है। चेतावनी दी गई है कि बीजिंग, तेहरान के साथ मिलकर दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण तेल जलमार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर अपना प्रभाव या पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की योजना बना रहा है। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र पूरी तरह बदल जाएगा।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवन रेखा

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया की ‘ऊर्जा धमनी’ माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से यह मार्ग प्रभावी रूप से बाधित हो गया है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई है और कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मार्ग पर किसी भी देश का एकाधिकार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला सकता है, और चीन इसी मौके की तलाश में है।

चीन का ‘रणनीतिक तख्तापलट’: क्या है बीजिंग का मास्टरस्ट्रोक?

विभिन्न रिपोर्ट्स संकेत देती हैं कि चीन इस संकट को एक अवसर के रूप में देख रहा है। चीन और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य और आर्थिक नजदीकियां इस जलमार्ग पर ‘संयुक्त नियंत्रण’ की दिशा में एक कदम हो सकती हैं। यदि चीन इस मार्ग को नियंत्रित करने में सफल रहता है, तो वह न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर लेगा, बल्कि पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था की चाबी भी अपने हाथ में ले लेगा। इसे विशेषज्ञ एक ‘रणनीतिक तख्तापलट’ मान रहे हैं, जो अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व को सीधी चुनौती देगा।

25 साल की रणनीतिक साझेदारी और अरबों डॉलर का निवेश

चीन और ईरान के संबंध पिछले कुछ वर्षों में एक नए स्तर पर पहुँच गए हैं। 2021 में दोनों देशों ने 25 साल के रणनीतिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत चीन ने ईरान के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश का वादा किया है, जिसके बदले में उसे रियायती दरों पर तेल मिलता है। अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के बावजूद चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है। इसके अलावा, ओमान, यूएई और पाकिस्तान (ग्वादर) के बंदरगाहों पर चीन की बढ़ती मौजूदगी उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का हिस्सा है।

अमेरिका की घटती सक्रियता और भारत पर संभावित प्रभाव

कार्नेगी के विशेषज्ञों का तर्क है कि इस क्षेत्र में अमेरिका की पारंपरिक सक्रियता में कमी आई है, जिससे पैदा हुए ‘शक्ति के शून्य’ (Power Vacuum) को चीन भरने की कोशिश कर रहा है। खाड़ी देश भी अब अपनी सुरक्षा और व्यापार के लिए केवल वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रहना चाहते और बीजिंग की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं। हालांकि, इस स्थिति का सबसे बुरा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और चीन का नियंत्रण बढ़ता है, तो भारत में महंगाई बढ़ेगी, रुपया कमजोर होगा और आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ना तय है।

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