Iran-US Conflict
Iran-US Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच 40 दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद दो हफ्तों के संघर्षविराम (सीजफायर) ने दुनिया को राहत की सांस लेने का मौका दिया था। लेकिन अब इस्लामाबाद में हुई महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक के बेनतीजा रहने से इस शांति पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और आम लोगों के बीच यह डर बढ़ गया है कि क्या सीजफायर की अवधि आगे बढ़ पाएगी या दोनों देश एक बार फिर युद्ध के मैदान में आमने-सामने होंगे। वार्ता की विफलता ने इस आशंका को जन्म दिया है कि संघर्षविराम का उल्लंघन कभी भी हो सकता है, जिससे पश्चिम एशिया में फिर से बारूद की गंध फैल सकती है।
भले ही इस्लामाबाद की बैठक में कोई आधिकारिक समझौता नहीं हो सका, लेकिन ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक रिपोर्ट ने उम्मीद की एक किरण जगाई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच सुलह की गुंजाइश अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अमेरिका और ईरान के कड़े बयानों के बावजूद पर्दे के पीछे द्विपक्षीय कूटनीति के द्वार खुले हुए हैं। क्षेत्र के अन्य मध्यस्थ देश भी अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि दो सप्ताह के इस युद्धविराम को और आगे बढ़ाया जा सके और किसी भी तरह से दोबारा गोलाबारी शुरू होने से रोकी जा सके।
ईरान ने अब समझौते के लिए अमेरिका के सामने एक नई और कड़ी शर्त रख दी है। ईरानी राष्ट्रपति महमूद पेज़ेश्कियन ने स्पष्ट लहजे में कहा कि यदि अमेरिकी सरकार अपना ‘साम्राज्यवादी और वर्चस्ववादी’ रवैया त्याग देती है, तो शांति की राह आसान हो सकती है। पेज़ेश्कियन ने जोर देकर कहा कि अमेरिका को ईरानी राष्ट्र के संप्रभु अधिकारों का सम्मान करना होगा। उनका मानना है कि जब तक वाशिंगटन ईरान को दबाने की नीति अपनाएगा, तब तक किसी भी स्थाई समझौते पर पहुँचना असंभव है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए अमेरिकी रुख की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने लिखा कि इस्लामाबाद में दोनों देश ऐतिहासिक ‘समझौते’ पर हस्ताक्षर करने से बस कुछ ही इंच दूर थे, लेकिन अंतिम समय में अमेरिका की ‘अतिवादी मांगों’ और बदलते लक्ष्यों ने सब कुछ बिगाड़ दिया। अराघची ने इसे पिछले 47 वर्षों में दोनों देशों के बीच हुई सबसे गंभीर और उच्चतम स्तर की वार्ता बताया। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सद्भावना से ही सद्भावना पैदा होती है, जबकि शत्रुता केवल शत्रुता को जन्म देती है।
विदेश मंत्री अराघची ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि अमेरिका ने इतिहास की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। ईरान का दावा है कि उसने युद्ध समाप्त करने के लिए पूरी ईमानदारी से बातचीत की मेज पर कदम रखा था, लेकिन अमेरिका की नाकाबंदी की धमकियों ने विश्वास की कमी पैदा कर दी। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अगले 48 घंटों में दोनों पक्ष क्या रुख अपनाते हैं। यदि सीजफायर की अवधि नहीं बढ़ाई गई, तो मध्य पूर्व में एक बार फिर बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क सकती है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति पर पड़ना निश्चित है।
इस्लामाबाद वार्ता के विफल होने के बाद तुर्की, कतर और पाकिस्तान जैसे देश सक्रिय हो गए हैं। ये देश अमेरिका और ईरान दोनों पर दबाव बना रहे हैं कि वे बातचीत की मेज पर वापस लौटें। इन देशों का मानना है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और केवल कूटनीति ही क्षेत्र में स्थिरता ला सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया सांसें थामकर देख रही है कि सीजफायर की समयसीमा खत्म होने के बाद क्या शांति बनी रहेगी या फिर मिसाइलों का शोर दोबारा सुनाई देगा।
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