Hormuz Crisis
Hormuz Crisis: इस्लामाबाद की धरती पर एक दशक से भी अधिक समय के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुई पहली सीधी कूटनीतिक बातचीत बिना किसी सकारात्मक परिणाम के समाप्त हो गई है। दुनिया भर की निगाहें इस ऐतिहासिक बैठक पर टिकी थीं, लेकिन 21 घंटों के गहन मंथन के बावजूद दोनों पक्ष किसी सामान्य समझौते पर पहुँचने में नाकाम रहे। इस विफलता ने न केवल मध्य-पूर्व में तनाव को कम करने की उम्मीदों को झटका दिया है, बल्कि वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है।
ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी ‘तस्नीम’ के अनुसार, तेहरान ने इस बातचीत के विफल होने के बाद स्पष्ट संदेश दिया है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है। ईरानी पक्ष के सूत्रों का कहना है कि उन्होंने अमेरिका की उन शर्तों को सिरे से खारिज कर दिया है जिन्हें वे ‘अव्यावहारिक और गैर-कानूनी’ मानते हैं। ईरान ने कड़े शब्दों में कहा है कि समझौते के लिए वह किसी जल्दबाजी में नहीं है और अब आगे का कोई भी रास्ता निकालने की जिम्मेदारी पूरी तरह से वाशिंगटन की है। तेहरान के अनुसार, अमेरिका को अपनी शर्तों में बदलाव कर अधिक व्यावहारिक रुख अपनाना होगा।
ईरानी प्रतिनिधियों ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उसने न केवल युद्ध के मैदान में बल्कि कूटनीतिक मंच पर भी ईरान की शक्ति और संकल्प का गलत आकलन किया है। तेहरान का मानना है कि अमेरिका की अब तक की ‘दबाव बनाने वाली रणनीति’ पूरी तरह विफल रही है। ईरान ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि जब तक अमेरिका अपनी पुरानी और अप्रभावी नीतियों को नहीं छोड़ता, तब तक किसी भी सार्थक बातचीत की गुंजाइश कम है। उनके मुताबिक, कूटनीति के लिए सम्मान और बराबरी का स्तर होना अनिवार्य है।
दूसरी तरफ, अमेरिका ने अपनी चिंताओं को प्रमुखता से सामने रखा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस वार्ता की विफलता पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ईरान ने उन बुनियादी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, जो वैश्विक शांति के लिए जरूरी थीं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण शर्त ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने की स्पष्ट प्रतिबद्धता थी। वेंस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि बातचीत का इस तरह टूटना अमेरिका से कहीं अधिक ईरान के लिए आर्थिक और रणनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा। अमेरिका का तर्क है कि वे क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते।
इस कूटनीतिक गतिरोध का सबसे गंभीर असर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) पर पड़ता दिख रहा है। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को लेकर अपनी चेतावनी दोहराई है। तेहरान ने कहा है कि जब तक कोई संतुलित और स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तब तक इस मार्ग की मौजूदा स्थिति में कोई ढील नहीं दी जाएगी। ज्ञात हो कि यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा है। यहाँ किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार में हाहाकार मचा सकता है, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतों में उछाल आने का खतरा पैदा हो गया है।
इस्लामाबाद वार्ता का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव को कम करना और एक स्थायी युद्धविराम की नींव रखना था। दशकों बाद हुई इस सीधी वार्ता से जो उम्मीदें जगी थीं, वे फिलहाल धूमिल होती नजर आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि यदि वाशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद का यह रास्ता पूरी तरह बंद हो गया, तो आने वाले समय में मध्य-पूर्व में सैन्य संघर्ष और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का दौर फिर से शुरू हो सकता है। फिलहाल, दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं, जिससे शांति की संभावनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
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