Iran-US Talks : ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए शांति समझौतों की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि दोनों देशों के बीच कटुता और अविश्वास की नई दीवार खड़ी हो गई है। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालीबाफ ने अमेरिका के प्रति अपने देश के अविश्वास को सार्वजनिक करते हुए एक बेहद तीखी टिप्पणी की है। गालीबाफ ने स्पष्ट किया है कि भले ही दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है, लेकिन ईरान को अमेरिका की नियत पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ईरान अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाह है।

जंग के लिए तैयार रहना ही कूटनीति का हिस्सा
इंडोनेशिया के पीपल्स कंसल्टेटिव असेंबली के स्पीकर अहमद मुजानी के साथ अपनी हालिया मुलाकात का जिक्र करते हुए गालीबाफ ने अपने आधिकारिक टेलीग्राम चैनल पर एक संदेश साझा किया। उन्होंने खुलासा किया कि 17 जून को हुई शांति वार्ता के दौरान उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के सामने यह बात दो-टूक शब्दों में रख दी थी कि ईरान का अमेरिका पर ‘जीरो ट्रस्ट’ है। गालीबाफ के अनुसार, “मेरी नजर में, सिर्फ वही लोग अमेरिका के साथ बातचीत करने की क्षमता रखते हैं जो स्वयं युद्ध के लिए मानसिक और सामरिक रूप से तैयार हों।” उन्होंने कहा कि ईरान ने कभी भी अपनी रक्षा तैयारियों को कम नहीं किया है और यदि अमेरिका शांति समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो ईरान ‘फुल-स्केल डिफेंस’ (पूर्ण रक्षात्मक कार्रवाई) के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।

डोनाल्ड ट्रंप ने किया युद्धविराम समाप्त होने का ऐलान
यह पूरा विवाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस हालिया बयान के बाद बढ़ा है, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ हुए संघर्ष विराम को औपचारिक रूप से समाप्त घोषित कर दिया है। ट्रंप ने कहा, “इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ने हमसे बातचीत जारी रखने का आग्रह किया था, जिसे हमने स्वीकार कर लिया है, लेकिन अमेरिका ने उन्हें स्पष्ट कर दिया है कि युद्धविराम (सीजफायर) अब खत्म हो चुका है।” ट्रंप का यह बयान दोनों देशों के बीच पहले से चल रही कूटनीतिक कोशिशों को एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इससे खाड़ी क्षेत्र में फिर से सैन्य टकराव की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
शांति समझौता और सीजफायर की विफलता
ईरान और अमेरिका के बीच यह तनावपूर्ण स्थिति उस शांति समझौते के विफल होने के बाद बनी है, जिस पर 17 जून को बड़े उत्साह के साथ हस्ताक्षर किए गए थे। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह संघर्ष विराम दो सप्ताह का समय भी पूरा नहीं कर पाया। 25 जून को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमले के साथ ही शांति वार्ता का छलावा बिखर गया। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और जवाबी हमलों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने पूरे क्षेत्र को फिर से युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। ईरान का स्पष्ट कहना है कि वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अंत तक लड़ने को तैयार है और अमेरिका का कोई भी दबाव उसे झुका नहीं सकता।
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