Israel Arab community crime
Israel Arab community crime: इजरायल के भीतर आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बेहद नाजुक होती जा रही है। विशेषकर इजरायली-अरब समुदाय के बीच संगठित अपराध और आपसी रंजिश के चलते खून-खराबे का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा घटनाक्रम में, देश के विभिन्न हिस्सों से दिल दहला देने वाली खबरें सामने आई हैं। महज 12 घंटे के संक्षिप्त अंतराल में पांच इजरायली-अरब नागरिकों को सरेआम गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। इन ताबड़तोड़ हत्याओं ने न केवल पुलिसिया सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि पूरे देश के नागरिकों में असुरक्षा और भय का माहौल पैदा कर दिया है।
आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद भयावह नजर आती है। साल 2026 की शुरुआत हुए अभी मात्र सवा महीना ही बीता है, लेकिन इस दौरान इजरायली-अरब बस्तियों और शहरों में अब तक 44 लोग आपराधिक हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पिछला साल (2025) इजरायल के इतिहास में सबसे हिंसक वर्ष के रूप में दर्ज हुआ था, जिसमें कुल 252 हत्याएं हुई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हिंसा की यही रफ्तार बनी रही, तो मौजूदा साल पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ देगा। अपराध की यह बढ़ती दर वहां के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को खोखला कर रही है।
देश में बढ़ती हत्याओं और बेलगाम संगठित अपराध के विरोध में जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। अब केवल अरब नागरिक ही नहीं, बल्कि यहूदी समुदाय के लोग भी उनके साथ मिलकर बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। पूरे इजरायल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि सरकार अवैध हथियारों के प्रसार को रोकने और आपराधिक सिंडिकेट की कमर तोड़ने में बुरी तरह विफल रही है। आम लोगों के बीच यह धारणा प्रबल हो रही है कि सरकार अरब समुदायों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है और उनकी उपेक्षा कर रही है।
विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत 10 जनवरी को जाफा के प्रसिद्ध ‘क्लॉक स्क्वायर’ से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन यरूशलम, बीर-शेवा, लोद, तामरा और जिस्र-ए-जारका जैसे प्रमुख शहरों तक फैल गया है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे पूर्व सांसद और ‘उच्च अरब निगरानी समिति’ के अध्यक्ष जमाल जाहल्का ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू से सीधे तौर पर कार्रवाई की मांग की है। जाहल्का ने राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर को बर्खास्त करने की मांग करते हुए कहा है कि उनके नेतृत्व में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अरब समुदायों में संगठित अपराध की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। इन इलाकों में अवैध हथियारों की कोई कमी नहीं है, जिसका इस्तेमाल आपराधिक गिरोह वर्चस्व की जंग और फिरौती के लिए कर रहे हैं। पुलिस की कार्रवाई अब तक केवल छिटपुट छापेमारी तक सीमित रही है, जो अपराधियों के हौसले पस्त करने में नाकाफी साबित हुई है। प्रशासन की ओर से ठोस और सख्त कदम न उठाए जाने के कारण आम नागरिक अब खुद को अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करने लगा है।
इजरायल के भीतर फैली इस असुरक्षा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सबका ध्यान खींचा है। मानवाधिकार संगठनों ने इजरायल सरकार से मांग की है कि वह अपने सभी नागरिकों, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों, उनकी जान-माल की रक्षा सुनिश्चित करे। समाज में व्याप्त यह तनाव न केवल आंतरिक स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि यह इजरायल के सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचा रहा है। अब सबकी नजरें प्रधानमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं कि वे इस खूनी संघर्ष को रोकने के लिए क्या कठोर कदम उठाते हैं।
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