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Lebanon Israel War: लेबनान में इजरायल का ‘रफाह मॉडल’, बारूद से उड़ाई गईं पूरी बस्तियां, श्मशान घाट जैसा सन्नाटा!

Lebanon Israel War:  दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना और हिजबुल्लाह के बीच जारी संघर्ष ने अब एक विनाशकारी मोड़ ले लिया है। इजरायली सेना (IDF) ने सीमावर्ती लेबनानी गांवों को पूरी तरह से नक्शे से मिटाने के लिए एक आक्रामक अभियान छेड़ दिया है। सोशल मीडिया पर सामने आए कई फुटेज में देखा गया है कि इजरायली सैनिक तैबेह, नकौरा और देर सेरियन जैसे ऐतिहासिक गांवों के घरों में भारी मात्रा में विस्फोटक लगा रहे हैं और फिर एक बटन दबाकर पूरे मोहल्ले को मलबे के ढेर में तब्दील कर रहे हैं। यह तबाही केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे के पूरे नागरिक ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है।

‘डोमिसाइड’ की भयावह रणनीति: रहने लायक नहीं बचेंगे गांव

इजरायल की इस कार्रवाई को विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने ‘डोमिसाइड’ करार दिया है। यह एक ऐसी क्रूर सैन्य रणनीति है जिसका उद्देश्य केवल दुश्मन को मारना नहीं, बल्कि नागरिकों के रहने की जगह को इस कदर बर्बाद कर देना है कि वहां दोबारा जीवन संभव न हो सके। इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि सीमावर्ती इलाकों में ‘रफाह मॉडल’ लागू किया जाएगा। गौरतलब है कि रफाह मॉडल के तहत गाजा में करीब 90% बुनियादी ढांचे को जमींदोज कर दिया गया था। अब वही पैटर्न लेबनान की दक्षिणी सीमा पर दोहराया जा रहा है ताकि एक वीरान क्षेत्र (बफर जोन) बनाया जा सके।

सुरंगों का बहाना और मानवाधिकारों का उल्लंघन

इजरायली रक्षा बलों का तर्क है कि ये रिहायशी घर हिजबुल्लाह के आतंकी बुनियादी ढांचे, सुरंगों और हथियारों के गोदामों के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे थे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों और युद्ध पर्यवेक्षकों ने इन दावों पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, रिमोट कंट्रोल के जरिए पूरे गांवों को उड़ाना अंधाधुंध तबाही है, जो जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। अंतरराष्ट्रीय कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि जब तक कोई नागरिक इमारत सीधी सैन्य चुनौती न दे, उसे नष्ट करना वर्जित है। लेकिन दक्षिणी लेबनान में हो रहे ये धमाके भविष्य की बसावट की हर उम्मीद को खत्म कर रहे हैं।

लिटानी नदी तक ‘सुरक्षा क्षेत्र’ और विस्थापन का गहराता संकट

इजरायल ने रणनीतिक रूप से संकेत दिया है कि उसका लक्ष्य लिटानी नदी तक के क्षेत्र पर नियंत्रण कर एक स्थाई ‘सुरक्षा क्षेत्र’ स्थापित करना है। इस योजना ने लेबनान के लाखों विस्थापित लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है। सीमा के पास रहने वाले नागरिकों को अब यह डर सता रहा है कि वे शायद कभी अपने पैतृक घरों को देख भी नहीं पाएंगे। लेबनानी अधिकारियों का मानना है कि इजरायल जानबूझकर सीमा के किनारे एक ऐसा ‘नो-मैन्स लैंड’ बनाना चाहता है, जहां भविष्य में कोई भी नागरिक आबादी न बस सके, जिससे हिजबुल्लाह के लिए छिपने की जगह खत्म हो जाए।

यादों का अंत: अहमद अबू ताम जैसे हजारों नागरिकों का दर्द

इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वहां के आम लोग चुका रहे हैं। तैबेह गांव के निवासी 56 वर्षीय अहमद अबू ताम का दर्द इस त्रासदी की हकीकत बयां करता है। उन्होंने नम आंखों से बताया, “जिस चौक पर मेरी पूरी जिंदगी बीती, जहां मेरी दुकान थी और मेरे बच्चों की यादें थीं, उसे इजरायली सेना ने एक धमाके में उड़ा दिया। उस धुएं के गुबार के साथ ही मुझे समझ आ गया कि अब मैं अपनी जमीन पर लौटकर भी पराया रहूंगा। उन्होंने सिर्फ ईंटें नहीं गिराईं, उन्होंने हमारा वजूद मिटा दिया है।” अहमद जैसे हजारों लोग आज शरणार्थी शिविरों में अपनी उजड़ी हुई दुनिया का मातम मना रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय चुप्पी और भविष्य की अनिश्चितता

जैसे-जैसे इजरायल अपने ‘रफाह मॉडल’ को लेबनान में विस्तार दे रहा है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और अधिक सवाल खड़े कर रही है। दक्षिण लेबनान के उपजाऊ और रिहायशी इलाके अब खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो लेबनान को न केवल एक बड़े मानवीय संकट का सामना करना पड़ेगा, बल्कि उसकी संप्रभुता और भूगोल में भी ऐसा बदलाव आएगा जिसे आने वाले कई दशकों तक ठीक नहीं किया जा सकेगा। दक्षिण लेबनान की यह वीरानगी आने वाले समय में क्षेत्रीय अस्थिरता का नया कारण बन सकती है।

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