Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि पिता की मृत्यु के बाद उसके नाबालिग बच्चों की परवरिश और भरण-पोषण की जिम्मेदारी दादा पर होती है। कोर्ट ने यह फैसला बलौदा-भाटापारा जिले के पलारी तहसील के बालौदी गांव की एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।

महिला ने अपने तीन नाबालिग बच्चों के लिए भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। फैमिली कोर्ट ने फरवरी 2023 में दिए फैसले में यह माना कि महिला को भले ही भरण-पोषण का हक नहीं है, लेकिन उसके बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी दादा की है। कोर्ट ने हर बच्चे को ₹2,000 प्रतिमाह देने का आदेश दिया।

यह मामला हाई कोर्ट तक तब पहुंचा जब ससुर ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उनका कहना था कि बहू और उनके बेटे का विवाह कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं है, ऐसे में वे बच्चों के पालन-पोषण के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते। लेकिन हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद शामिल थे, ने अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने निर्णय में हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग बच्चे “आश्रित” की श्रेणी में आते हैं और उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी परिवार के बड़े सदस्य, विशेष रूप से दादा-दादी पर होती है। चूंकि ससुर ने स्वयं यह स्वीकार किया कि बच्चे उनके बेटे की संतान हैं और उनके घर में पैदा हुए, इसलिए भरण-पोषण से मुकरा नहीं जा सकता।
बहू को नहीं मिला भरण-पोषण
हालांकि, कोर्ट ने बहू की भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि विवाह का कानूनी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका है, इसलिए महिला को “आश्रित” के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के पी.के. पलानीसामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका में धारा का गलत उल्लेख होना याचिका को अमान्य नहीं बनाता।

महिला ने दावा किया कि उसकी शादी वर्ष 2008 में रेशम लाल साहू से हुई थी और उनके तीन बच्चे हुए। कुछ समय बाद पति ने प्रताड़ित करना शुरू किया और अंततः 2018 में आत्महत्या कर ली। इसके बाद महिला बच्चों के साथ ससुराल में रही, लेकिन वहां भी उन्हें बुनियादी जरूरतों से वंचित रखा गया। गांव की पंचायत ने ससुर को बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन उन्होंने उसे मानने से इनकार कर दिया।यह फैसला न केवल बच्चों के हितों की रक्षा करता है, बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियों की कानूनी व्याख्या को भी स्पष्ट करता है। हाई कोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां नाबालिग बच्चों के अधिकारों की रक्षा जरूरी हो।
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