Jagannath Puri: ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर सनातन धर्म के पवित्र चार धामों में से एक माना जाता है। इस पावन धाम में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण अपने अनूठे ‘जगन्नाथ’ रूप में विराजमान हैं। उनके साथ रत्नवेदी पर उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा जी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। हर वर्ष आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यहाँ विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। साल 2026 में इस भव्य रथ यात्रा महोत्सव का शुभारंभ 16 जुलाई से होने जा रहा है, जो कि 24 जुलाई तक पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ चलेगा।

अधूरी मूर्तियों के पीछे छिपा है गहरा आध्यात्मिक रहस्य
इस पावन उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों के अलग-अलग विशाल रथ तैयार किए जाते हैं। पुरी के इस मुख्य मंदिर के साथ कई ऐसी प्राचीन कथाएं, लोक मान्यताएं और अनसुलझे रहस्य जुड़े हुए हैं, जिन्हें सुनकर आधुनिक वैज्ञानिक और आम लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान की पवित्र मूर्तियां आज भी अधूरी मानी जाती हैं, जिनके हाथ-पैर पूरी तरह विकसित नहीं हैं। भक्तगण सदियों से इन्हीं अधूरी मूर्तियों की पूजा परम आस्था के साथ करते आ रहे हैं। आइए जानते हैं कि आखिर इन मूर्तियों के अधूरे रहने का वास्तविक रहस्य क्या है।

पौराणिक प्रसंग: जब राधा रानी के प्रेम में लीन हुए श्रीकृष्ण
एक बार भगवान श्रीकृष्ण निद्रा की अवस्था में अपनी प्रिय राधा रानी का नाम पुकारने लगे। यह सुनकर द्वारका में मौजूद उनकी सभी रानियां बेहद अचंभित हो गईं। वे यह जानने के लिए व्याकुल हो उठीं कि इतने वर्षों बाद भी श्रीकृष्ण राधा जी को क्यों नहीं भूल पाए हैं। इस रहस्य को जानने के लिए सभी रानियां माता रोहिणी के पास पहुँचीं। माता रोहिणी ने उन्हें कथा सुनाना स्वीकार तो किया, लेकिन एक शर्त रखी कि कथा सुनते समय कोई भी अंदर न आ पाए। इसके लिए उन्होंने सुभद्रा को मुख्य द्वार पर पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया।
कथा सुनते-सुनते तीनों भाई-बहन आ गए भाव-अवस्था में
जब माता रोहिणी भीतर एकांत में दिव्य कथा सुना रही थीं, तभी वहां अचानक भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम भी आ पहुंचे। सुभद्रा ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए दोनों को दरवाजे पर ही रोक दिया। परंतु, रोहिणी माता की आवाज इतनी दिव्य थी कि वह कमरे से बाहर तक गूंज रही थी। मुख्य द्वार पर खड़े होकर श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा तीनों ही उस प्रेम कथा को बड़े ध्यान से सुनने लगे। कथा के आध्यात्मिक रस में डूबकर तीनों भाई-बहन ऐसी परम भाव-अवस्था (महाभाव) में चले गए कि भक्ति के अतिरेक से उनके हाथ-पैर संकुचित होकर अदृश्य होने लगे और आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं। इसी समय वहां देवऋषि नारद का आगमन हुआ और वे तीनों का यह अलौकिक रूप देखकर दंग रह गए।
देवशिल्पी विश्वकर्मा ने राजा इंद्रद्युम्न के सामने रखी कठिन शर्त
नारद जी ने उस अद्भुत अवस्था को देखकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे इसी महाभाव रूप में पृथ्वी पर सामान्य भक्तों को दर्शन देने के लिए निवास करें, जिसे भगवान ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस दैवीय संकल्प को पूरा करने के लिए मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने मूर्तियों के निर्माण का बीड़ा उठाया। तब स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध मूर्तिकार का रूप धारण कर राजा के दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने राजा से कहा कि वे जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की दिव्य प्रतिमाएं बना सकते हैं, लेकिन उनकी एक बेहद कठिन शर्त होगी। उन्होंने कहा कि वे बंद कमरे में अकेले 21 दिनों तक काम करेंगे और इस दौरान कोई भी उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
राजा की एक छोटी सी भूल और मूर्तियां हमेशा के लिए रह गईं अधूरी
राजा इंद्रद्युम्न ने मूर्तिकार की शर्त मान ली और बंद कमरे में निर्माण कार्य शुरू हो गया। शुरुआत के कुछ दिनों तक कमरे के भीतर से आरी, हथौड़ी और छैनी चलने की आवाजें नियमित रूप से आती रहीं। परंतु, कुछ दिनों के बाद अचानक कमरे के भीतर से आने वाली सभी आवाजें पूरी तरह बंद हो गईं। राजा व्याकुल हो उठे और कौतूहलवश उन्होंने विश्वकर्मा जी की शर्त को भूलकर कमरे का मुख्य दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही वृद्ध मूर्तिकार अंतर्ध्यान हो गए और कमरे में तीनों मूर्तियां बिना हाथ-पैर के अधूरी ही छूट गईं। राजा को अपनी इस भूल पर भारी पश्चाताप हुआ, लेकिन बाद में इसे ही ईश्वर की परम इच्छा मानकर उन्हीं अधूरी प्रतिमाओं को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया गया। तब से आज तक भगवान इसी रूप में पूजे जाते हैं।
Read More : Jagannath Rath Yatra 2026: जानें पुरी में भव्य उत्सव की तिथि, महत्व और ऐतिहासिक कथा











