Asola Bhatti Wildlife : दिल्ली के असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य से वन्यजीव प्रेमियों और वन अधिकारियों के लिए बेहद सुखद समाचार सामने आया है। यहां तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी और उनकी गतिविधियों ने अधिकारियों को खासा उत्साहित कर दिया है। वन विभाग द्वारा लगाए गए ‘कैमरा ट्रैप’ में अब तेंदुओं के जोड़े लगातार रिकॉर्ड किए जा रहे हैं, जो इस क्षेत्र में पारिस्थितिकी तंत्र के समृद्ध होने का स्पष्ट संकेत है। अधिकारियों के अनुमान के अनुसार, 2022 में जहां यहां तेंदुओं की संख्या 12 से 14 के बीच थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 16 तक पहुंच गई है। हालांकि, विभाग का यह भी कहना है कि यह आंकड़ा प्रारंभिक कैमरा ट्रैप रिकॉर्ड और निगरानी पर आधारित है, और इसकी सटीक पुष्टि गहन गणना के बाद ही की जाएगी।

तेंदुओं के जोड़ों का दिखना पारिस्थितिकी सुधार का बड़ा संकेत
वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए सबसे अधिक उत्साहजनक पहलू अभयारण्य में तेंदुओं के जोड़ों का बार-बार दिखाई देना है। तेंदुए स्वभाव से एकांतप्रिय जानवर होते हैं और आमतौर पर वे केवल प्रजनन काल या अपने शावकों की देखभाल के समय ही जोड़े में नजर आते हैं। ऐसी गतिविधियों का बार-बार रिकॉर्ड होना इस बात की पुष्टि करता है कि अभयारण्य का प्राकृतिक वातावरण अब तेंदुओं के प्रजनन और उनके वंश वृद्धि के लिए पूरी तरह अनुकूल हो गया है। कुछ वर्षों पूर्व तक यहां तेंदुओं का दिखना एक असामान्य घटना मानी जाती थी, लेकिन आज अत्याधुनिक निगरानी तकनीकों के कारण उनकी दिनचर्या को बेहतर ढंग से समझा जा रहा है।

जैव-विविधता का विस्तार: चीतल, जंगली सूअर और मोरों की संख्या बढ़ी
वन्यजीवों की आबादी में यह वृद्धि केवल तेंदुओं तक ही सीमित नहीं है। अभयारण्य में चीतल, जंगली सूअरों और मोरों की संख्या में भी अप्रत्याशित उछाल आया है। मोर अब अभयारण्य के लगभग हर हिस्से में झुंड के झुंड में घूमते हुए देखे जा सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, मोर, फ्रैंकोलिन और हिरण जैसी प्रजातियां ‘संकेतक प्रजाति’ (Indicator Species) के रूप में कार्य करती हैं। इनकी संख्या में बढ़ोतरी इस बात का प्रमाण है कि आवास की गुणवत्ता में व्यापक सुधार हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि इन जानवरों के लिए भोजन, पानी और सुरक्षित आश्रय अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
सफल आवास प्रबंधन और बेहतर पारिस्थितिकी सुधार का परिणाम
इस सकारात्मक बदलाव का श्रेय पिछले कई वर्षों में किए गए निरंतर आवास प्रबंधन प्रयासों को जाता है। वन विभाग ने अभयारण्य के भीतर 200 से अधिक जलकुंडों का निर्माण और रखरखाव किया है, जिससे भीषण गर्मी के दौरान भी वन्यजीवों को साल भर पानी उपलब्ध रहता है। इसके अतिरिक्त, वर्षों पूर्व किए गए वृक्षारोपण के परिणाम अब घने हरे-भरे जंगलों के रूप में सामने आए हैं, जिन्होंने वन्यजीवों को रहने के लिए एक सुरक्षित ‘कैनापी’ (घना छत्र) प्रदान की है। एक समय जो क्षेत्र केवल हरियाणा के अरावली जंगलों से दिल्ली को जोड़ने वाला गलियारा मात्र था, वह अब तेंदुओं के लिए एक स्थाई और अनुकूल आवास में तब्दील हो रहा है। वन्यजीवों का यहां अधिक समय बिताना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली का यह वन्यजीव अभयारण्य एक स्वस्थ और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की ओर तेजी से अग्रसर है।
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