Jagannath Rath Yatra 2026: हर 12 साल में क्यों बदलती है भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा?

Jagannath Rath Yatra 2026: ओडिशा के पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में आषाढ़ माह की शुरुआत के साथ ही उत्सव का माहौल छा गया है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। इस वर्ष यह धार्मिक महोत्सव 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथयात्रा के दौरान प्रभु के रथों की रस्सियों को खींचने मात्र से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस रथयात्रा में शामिल होने के लिए देश-दुनिया से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और भक्ति के सागर में डूब जाते हैं।

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‘नवकलेवर’ अनुष्ठान: 12 साल में क्यों बदल दिए जाते हैं भगवान?

पुरी स्थित जगन्नाथ धाम के कई रहस्य ऐसे हैं, जिन्हें जानकर विज्ञान और तर्क भी नतमस्तक हो जाते हैं। इन्हीं में से एक है ‘नवकलेवर’ अनुष्ठान, जिसके तहत हर 12 वर्षों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन जी की काष्ठ (लकड़ी) प्रतिमाओं को बदल दिया जाता है। ‘नवकलेवर’ का शाब्दिक अर्थ है ‘नया शरीर’। इन मूर्तियों को नीम की विशेष लकड़ी से निर्मित किया जाता है। माना जाता है कि समय के साथ लकड़ी की प्रतिमाएं खंडित न हों, इसलिए उन्हें परिवर्तित करना अनिवार्य होता है। यह प्रक्रिया केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि भगवान के नश्वर रूप से दिव्य रूप में परिवर्तन का एक अति गोपनीय और पवित्र प्रतीक मानी जाती है।

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अत्यंत गुप्त होता है अनुष्ठान, मंदिर के पुजारी भी नहीं देख पाते

नवकलेवर का अनुष्ठान अत्यंत गोपनीयता और कड़ी सुरक्षा के बीच संपन्न होता है। इस प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए अनुष्ठान के दौरान पूरे शहर की विद्युत आपूर्ति (लाइटें) बंद कर दी जाती है ताकि संपूर्ण क्षेत्र में अंधकार छा जाए। मान्यताओं के अनुसार, यह कार्य पूरी तरह गुप्त रखा जाता है ताकि इस दिव्य प्रक्रिया पर किसी साधारण मनुष्य की नजर न पड़े। आश्चर्य की बात यह है कि प्रतिमा परिवर्तन करने वाले प्रधान पुजारी भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर यह कार्य संपन्न करते हैं। वे न तो मूर्तियों को सीधे देखते हैं और न ही उन्हें छूते हैं, बल्कि एक विशेष आध्यात्मिक विधि के माध्यम से वे ‘ब्रह्म पदार्थ’ को पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थानांतरित करते हैं।

नीम की लकड़ी का चयन और दैवीय मान्यताएं

भगवान की नई प्रतिमाएं बनाने के लिए लकड़ी के चयन की प्रक्रिया भी अद्भुत है। इसके लिए केवल नीम के पेड़ों का उपयोग किया जाता है, जो कम से कम 100 वर्ष पुराने और दोषरहित होने चाहिए। मुख्य पुजारी स्वप्न के माध्यम से या दैवीय संकेतों से उन विशेष पेड़ों का चुनाव करते हैं जिनमें भगवान के निवास का संकेत मिलता है। यह प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है और मंदिर की परंपराओं का अभिन्न अंग है। पुरी जगन्नाथ मंदिर के इन रहस्यों ने इसे न केवल एक धार्मिक केंद्र, बल्कि आस्था और आश्चर्य का अद्भुत संगम बना दिया है, जिसे जानने की जिज्ञासा हर भक्त के मन में बनी रहती है।

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Chandan Das

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