Mahabharata: महाभारत का युद्ध केवल सत्ता या राज्य के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच का एक भीषण महासंग्राम था। कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमि पर 18 दिनों तक चले इस युद्ध में न केवल असंख्य वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, बल्कि यह मानवता के इतिहास का सबसे बड़ा नीतिगत द्वंद्व भी बना। इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को एक तटस्थ भूमिका में रखा। उन्होंने घोषणा की थी कि वे पांडवों के पक्ष में रहते हुए अर्जुन के रथ के सारथी तो बनेंगे, लेकिन पूरे युद्ध के दौरान स्वयं शस्त्र नहीं उठाएंगे। दूसरी ओर, कौरवों ने अपनी पूरी शक्ति के साथ युद्ध में हिस्सा लिया था। भगवान का यह प्रण कौरवों और पांडवों दोनों के लिए एक परीक्षा की तरह था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

युद्ध का दसवां दिन और पांडव सेना पर आया संकट
महाभारत के युद्ध के दसवें दिन तक आते-आते स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई थी। भीष्म पितामह के पराक्रम से पांडव सेना का मनोबल डगमगाने लगा था और कौरवों के प्रहार इतने घातक थे कि पांडवों की सेना पूरी तरह बिखरती हुई दिखाई देने लगी। स्थिति को अत्यंत नाजुक और धर्म की हानि होते देख भगवान श्रीकृष्ण का धैर्य जवाब दे गया। उन्हें इस बात का भान था कि यदि भीष्म पितामह का संहार तुरंत नहीं किया गया, तो धर्म की रक्षा करना असंभव हो जाएगा। अपने भक्त अर्जुन की रक्षा और धर्म की विजय सुनिश्चित करने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने अपना सारथी का धर्म एक क्षण के लिए किनारे कर दिया और वे क्रोध से भरकर रथ से नीचे उतर आए।

जब श्रीकृष्ण ने हाथ में लिया रथ का चक्र, भीष्म हुए नतमस्तक
भगवान श्रीकृष्ण ने क्रोध में आकर एक विशाल रथ का पहिया (चक्र) उठा लिया और वे सीधे पितामह भीष्म की ओर उन्हें समाप्त करने के लिए दौड़ पड़े। वह दृश्य देखकर तीनों लोक स्तब्ध रह गए। दूसरी ओर, भीष्म पितामह ने जब स्वयं नारायण को अपनी ओर आते देखा, तो उनके भीतर का अहंकार मिट गया और वे अत्यंत प्रसन्न हुए। वे जानते थे कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उन्हें मोक्ष प्रदान करने के लिए आ रहे हैं। उन्होंने खुशी-खुशी अपने धनुष-बाण त्याग दिए और श्रीकृष्ण के सामने नतमस्तक हो गए। इस अलौकिक दृश्य को देखकर अर्जुन हतप्रभ रह गए और उन्हें भगवान की वह प्रतिज्ञा याद आई, जो उन्होंने युद्ध के आरंभ में की थी।
अर्जुन की विनय और धर्म की रक्षा का मार्ग
अर्जुन ने तत्काल दौड़कर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को पकड़ लिया और उन्हें उनकी प्रतिज्ञा का स्मरण कराया। अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक भगवान से कहा कि यदि वे स्वयं शस्त्र उठा लेंगे, तो लोग युगों-युगों तक उनकी प्रतिज्ञा पर प्रश्न उठाएंगे। अर्जुन की विनती और करुणा से द्रवित होकर भगवान श्रीकृष्ण शांत हुए। उन्होंने रथ का पहिया नीचे रख दिया और पुनः सारथी की भूमिका में वापस लौट आए। श्रीकृष्ण के द्वारा रथ का पहिया उठाने की इस घटना का अत्यंत विस्तार से वर्णन महाभारत के ‘भीष्म पर्व’ में मिलता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब-जब धर्म पर संकट आता है, तब-तब भगवान स्वयं नियमों की मर्यादा को अपने भक्त की रक्षा के लिए गौण कर देते हैं।
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