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Jallianwala Bagh Anniversary: जलियांवाला बाग की 107वीं बरसी, आज भी रोंगटे खड़े कर देता है खूनी बैसाखी का वो मंजर!

Jallianwala Bagh Anniversary: आज से ठीक 107 साल पहले, 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में बर्बरता की जो कहानी लिखी गई, उसकी गूँज आज भी हर भारतीय के दिल में सुनाई देती है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि वो गहरा जख्म है जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी। ब्रिटिश हुकूमत ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां बरसाकर इंसानियत को शर्मसार कर दिया था। ताज्जुब की बात यह है कि एक सदी बीत जाने के बाद भी ब्रिटेन ने इस जघन्य अपराध के लिए आधिकारिक तौर पर माफी नहीं मांगी है।

प्रथम विश्व युद्ध और भारतीयों के साथ विश्वासघात

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान करीब 13 लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश झंडे के नीचे अपनी जान की बाजी लगाई थी। देशवासियों को उम्मीद थी कि इस निष्ठा के बदले अंग्रेज भारत को स्वशासन देंगे या कम से कम दमनकारी नीतियों में ढील बरतेंगे। लेकिन युद्ध समाप्त होते ही अंग्रेजों ने इनाम के बदले ‘रॉलेट एक्ट’ जैसा काला कानून थमा दिया। भारतीयों का खून-पसीना अंग्रेजों की जीत का आधार बना, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ और अधिक प्रताड़ना मिली।

रॉलेट एक्ट: बिना वकील, बिना अपील का काला कानून

साल 1919 में लागू हुए रॉलेट एक्ट ने अंग्रेजी सरकार को असीमित शक्तियां दे दीं। इस कानून के तहत किसी भी भारतीय को बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता था और बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में रखा जा सकता था। इसे ‘बिना वकील, बिना अपील और बिना दलील’ का कानून कहा गया। पंजाब में इसका तीव्र विरोध हुआ, जिसका नेतृत्व डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल कर रहे थे। इन नेताओं की गिरफ्तारी ने जनता के आक्रोश को चरम पर पहुँचा दिया।

बैसाखी का वो मंजर और जनरल डायर की क्रूरता

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में करीब 20 हजार लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए जुटे थे। शहर में मार्शल लॉ लागू था, लेकिन लोग अपने नेताओं की रिहाई और रॉलेट एक्ट के विरोध में अपनी बात रखने आए थे। तभी जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ पहुँचा और बाग के एकमात्र निकास द्वार को ब्लॉक कर दिया। बिना किसी चेतावनी के उसने सैनिकों को सीधे भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।

10 मिनट का खौफ और 1650 राउंड गोलियां

अगले 10 मिनट तक जो हुआ, उसने धरती को लहूलुहान कर दिया। 1650 राउंड फायरिंग तब तक नहीं रुकी जब तक कि सैनिकों के पास गोलियां खत्म नहीं हो गईं। अपनी जान बचाने के लिए लोग बाग के बीच स्थित कुएं में कूद गए, लेकिन गोलियों ने वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। सरकारी आंकड़े भले ही 379 मौतों का दावा करते हों, लेकिन हकीकत में करीब 1500 बेगुनाह उस दिन शहीद हुए थे, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे।

स्वतंत्रता संग्राम में नई चेतना का उदय

इस नरसंहार ने भारतीयों के मन से अंग्रेजों का डर हमेशा के लिए निकाल दिया। युवाओं का खून खौल उठा और 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। जलियांवाला बाग की मिट्टी ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया। आज भी उस बाग की दीवारों पर गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि हमारी आजादी की कीमत कितनी भारी थी। यह इतिहास न कभी झुठलाया जा सकता है और न ही भुलाया जा सकता है।

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