Jammu and Kashmir : सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई (CJI BR Gavai) और जस्टिस के विनोद चंद्र की दो-न्यायाधीशों वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सीजेआई गवई ने याचिकाकर्ता की जल्द सुनवाई की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट कहा, “पहलगाम में जो हुआ, उसे आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। निर्णय लेना संसद और कार्यपालिका का काम है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि कोर्ट को फैसला लेते समय जमीनी सच्चाइयों का ध्यान रखना होगा।

केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि सरकार पहले ही चुनावों के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दे चुकी है। उन्होंने कहा, “देश के इस हिस्से की स्थिति अजीब है। मुझे समझ नहीं आता कि इसे लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है और अभी क्यों इस मुद्दे को उठाया जा रहा है।”
याचिकाकर्ता की दलील
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायण ने याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में दलील देते हुए 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को वैध ठहराने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने की उम्मीद जताई थी। लेकिन 21 महीने बीत जाने के बावजूद राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया।
कोर्ट ने सुनवाई टाली
इस मामले में याचिकाएं स्कूल टीचर जहूर अहमद भट और एक्टिविस्ट खुर्शीद अहमद द्वारा दायर की गई थीं। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आठ हफ्तों के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है।
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में जारी बहस एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। एक ओर जहां सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्र सरकार सतर्क है, वहीं याचिकाकर्ता संवैधानिक वादे की याद दिला रहे हैं। आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है।











