Japan Foreign Policy Crisis
Japan Foreign Policy Crisis: जापान वर्तमान में एक अत्यंत जटिल कूटनीतिक दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसे अपने दो प्रमुख पड़ोसियों—रूस और दक्षिण कोरिया—के साथ गंभीर विवादों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ रूस ने जापान की नीतियों को “अमैत्रीपूर्ण” करार देते हुए भविष्य के किसी भी शांति समझौते की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है, तो दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया के साथ विवादित द्वीपों को लेकर तनाव फिर से चरम पर पहुँच गया है। टोक्यो की इस दोहरी चुनौती ने न केवल पूर्व एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति संधि वार्ताओं के भविष्य पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने टोक्यो को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि जापान का वर्तमान रुख रूस के प्रति बिल्कुल भी सहयोगात्मक नहीं है। शुक्रवार को जारी एक कड़े बयान में उन्होंने स्पष्ट किया कि जापान के “अमैत्रीपूर्ण व्यवहार” के कारण दोनों देशों के बीच किसी भी सार्थक समझौते की उम्मीद फिलहाल न के बराबर है। यद्यपि जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने हाल ही में संसद में रूस के साथ शांति संधि करने और दशकों पुराने विवादों को सुलझाने की इच्छा जताई थी, लेकिन रूस ने इसे केवल कागजी दांव बताया है।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से रूस और जापान के बीच आज तक कोई औपचारिक शांति संधि नहीं हो सकी है, जिसका मुख्य कारण कुरील द्वीपों का विवाद है। यूक्रेन संकट शुरू होने के बाद जापान द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने आग में घी डालने का काम किया। इसके जवाब में रूस ने मार्च 2022 में शांति वार्ता को आधिकारिक तौर पर निलंबित कर दिया था। मॉस्को का स्पष्ट रुख है कि जब तक जापान पश्चिमी देशों के प्रभाव से बाहर निकलकर अपने व्यवहार में मौलिक बदलाव नहीं लाता, तब तक कूटनीतिक मेज पर वापसी संभव नहीं है।
रूस के अलावा, जापान का क्षेत्रीय विवाद दक्षिण कोरिया के साथ भी गहराता जा रहा है। विवाद की जड़ ‘डोक्डो’ द्वीप समूह है, जिसे जापान ‘ताकेशिमा’ कहता है। जापान ने हाल ही में इन द्वीपों पर अपने क्षेत्रीय दावे को नए सिरे से पेश किया है, जिसे दक्षिण कोरिया ने अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला माना है। सियोल स्थित विदेश मंत्रालय ने जापान के इन दावों का कड़ा विरोध करते हुए इसे ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों के खिलाफ बताया है। दक्षिण कोरियाई सरकार ने चेतावनी दी है कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
दक्षिण कोरिया ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष यह पक्ष रखा है कि डोक्डो द्वीप ऐतिहासिक साक्ष्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार दक्षिण कोरिया का अभिन्न अंग हैं। मंत्रालय ने जापान से अपने उकसावे वाले दावों को तत्काल वापस लेने की मांग की है। सियोल का मानना है कि जापान की यह विस्तारवादी नीति भविष्य उन्मुख द्विपक्षीय संबंधों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। इस कूटनीतिक खींचतान ने पूर्व एशिया में सुरक्षा और सहयोग के वातावरण को अस्थिर कर दिया है, जिससे अमेरिका जैसे साझेदारों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए जापान की विदेश नीति एक चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है। रूस ने साफ कर दिया है कि वह प्रतिबंधों के साये में कोई वार्ता नहीं करेगा, वहीं दक्षिण कोरिया के साथ बढ़ती कड़वाहट ने क्षेत्रीय गठबंधन को कमजोर किया है। दशकों पुराने शांति प्रयासों के ठंडे बस्ते में चले जाने से जापान के आर्थिक और सुरक्षा हितों को चोट पहुँच सकती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री साने ताकाइची का प्रशासन इन जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए कोई नया कूटनीतिक रोडमैप पेश करता है या जापान की यह ‘अकेले चलो’ की नीति उसे पड़ोसियों से और दूर कर देगी।
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