Jitiya Vrat Katha: जितिया व्रत, जिसे जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में संतान की लंबी उम्र और सुख-शांति के लिए किया जाने वाला सबसे कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से पूर्वांचल और बिहार क्षेत्र में बड़े श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। जितिया व्रत को निर्जला रखा जाता है, यानी इस दिन व्रती पूरी तरह से भोजन-जल से परहेज करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत का मुख्य उद्देश्य माता-पिता की संतान के लिए लंबी आयु, स्वस्थ जीवन और समृद्धि की कामना करना है। इस व्रत को करने वाली महिलाएं अपने बच्चों की सुरक्षा और खुशहाली के लिए कठोर तपस्या करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जितिया व्रत से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, जो बच्चों को जीवन की सभी बाधाओं से बचाता है और उनकी रक्षा करता है।
जितिया व्रत हर साल अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से शुरू होता है। इस व्रत का मुख्य दिन अष्टमी तिथि होती है, जब निर्जला व्रत रखा जाता है। इसके बाद नवमी तिथि को व्रत का पारण किया जाता है। इस बार यह व्रत रविवार, 14 सितंबर को मनाया जा रहा है।
जितिया व्रत के पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इस व्रत की पवित्रता और महत्व को दर्शाती हैं।
महाभारत युद्ध के दौरान, द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे की मृत्यु हो गई। जब भगवान श्रीकृष्ण को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने दिव्य शक्ति से उस मृत शिशु को पुनर्जीवित किया और उसका नाम जीवित्पुत्रिका रखा। तब से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए जितिया व्रत करती हैं।
एक बार चील और मादा सियार ने महिलाओं को जितिया व्रत करते देखा। भूख लगने पर सियारिन ने व्रत तोड़ा और मरे हुए जानवर का मांस खा लिया, जबकि चील ने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ व्रत पूरा किया। अगले जन्म में चील के सभी बच्चे जीवित रहे, लेकिन सियारिन के बच्चे जन्म के बाद ही मर गए। दुखी सियारिन ने चील से इसका कारण पूछा तो उसे व्रत के महत्व का पता चला। फिर उसने भी जितिया व्रत किया और स्वस्थ संतान प्राप्त की। यही वजह है कि जितिया व्रत संतान सुख के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत के दिन कथा का पाठ अत्यंत आवश्यक होता है। कहा जाता है कि कथा पढ़े बिना व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। कथा सुनने या पढ़ने से व्रती को भगवान की कृपा प्राप्त होती है और संतान की रक्षा सुनिश्चित होती है।
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