Creamy Layer Rule: केरल उच्च न्यायालय ने आरक्षण व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि नॉन-क्रीमी लेयर (Non-Creamy Layer) प्रमाणपत्र जारी करते समय निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन को भी आय के आकलन में शामिल किया जाएगा। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ नहीं दिया जा सकता कि उसकी आय निजी क्षेत्र की नौकरी से आती है। कोर्ट के अनुसार, क्रीमी लेयर की पहचान का उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न वर्ग को आरक्षण के लाभ से अलग रखना है, इसलिए निजी क्षेत्र की उच्च आय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकारी आदेश की अदालत ने की स्पष्ट व्याख्या
न्यायालय ने सरकार के उस आदेश की भी व्याख्या की, जिसमें कहा गया था कि वेतन और कृषि से होने वाली आय को एक साथ जोड़कर नहीं देखा जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का अर्थ वेतन को पूरी तरह आय के दायरे से बाहर करना नहीं है। इसका आशय केवल इतना है कि दोनों प्रकार की आय का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए। इसलिए निजी नौकरी से मिलने वाला वेतन भी आय निर्धारण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

दो छात्रों की याचिकाएं हुईं खारिज
यह फैसला न्यायमूर्ति बी.के. थॉमस की एकल पीठ ने दो छात्रों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। दोनों छात्र पेशेवर डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र प्राप्त करना चाहते थे। अदालत ने पाया कि दोनों मामलों में छात्रों के माता-पिता निजी क्षेत्र में उच्च वेतन वाली नौकरियों में कार्यरत थे। एक मामले में परिवार के पास लग्जरी कारें भी थीं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होने का संकेत मिला। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।
क्रीमी लेयर व्यवस्था के उद्देश्य पर अदालत की टिप्पणी
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि निजी क्षेत्र में ऊंचे वेतन वाले कर्मचारियों को क्रीमी लेयर की श्रेणी से बाहर रखा जाए, तो इससे आरक्षण नीति का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होगा। अदालत ने कहा कि क्रीमी लेयर की अवधारणा इसलिए बनाई गई थी ताकि आर्थिक रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके परिवार आरक्षण का लाभ न ले सकें। ऐसे में निजी क्षेत्र के उच्च आय वर्ग को इस प्रक्रिया से बाहर रखना न्यायसंगत नहीं होगा।
अदालत ने क्रीमी लेयर की श्रेणियों का किया उल्लेख
फैसले में न्यायालय ने क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए बनाई गई अनुसूची का भी उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि पहली श्रेणी में संवैधानिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के बच्चे आते हैं। दूसरी श्रेणी सेवा वर्ग से संबंधित है, जिसे तीन भागों—ग्रुप A, ग्रुप B और सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) में समकक्ष पदों—में विभाजित किया गया है। इन श्रेणियों के आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन क्रीमी लेयर में आएगा और कौन नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ पाने का पात्र होगा।
निजी क्षेत्र पर भी लागू होंगे समान सिद्धांत
उच्च न्यायालय ने कहा कि यही सिद्धांत निजी क्षेत्र में कार्यरत उन कर्मचारियों पर भी लागू होंगे, जो सरकारी अधिकारियों के समकक्ष या तुलनीय पदों पर कार्य कर रहे हैं। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि सरकार ने अब तक निजी क्षेत्र के समकक्ष पदों को अधिसूचित नहीं किया है। ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों का मूल्यांकन आय और संपत्ति के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही आकलन हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
केरल हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों के अनुसार क्रीमी लेयर की पहचान आर्थिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर की जानी चाहिए। केवल इसलिए कि सरकार ने निजी क्षेत्र के समकक्ष पदों की अधिसूचना जारी नहीं की है, यह नहीं माना जा सकता कि निजी क्षेत्र के सभी कर्मचारी स्वतः नॉन-क्रीमी लेयर की श्रेणी में आ जाएंगे।
उच्च वेतन वालों को स्वतः लाभ नहीं मिल सकता
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निजी क्षेत्र में ऊंचे वेतन पाने वाले कर्मचारियों की आय को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए, तो ऐसे परिवारों के बच्चों को केवल इस आधार पर नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिल जाएगा कि उनके पास अन्य स्रोतों से आय नहीं है। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करना क्रीमी लेयर व्यवस्था के मूल उद्देश्य के विपरीत होगा। इसलिए आय निर्धारण में निजी क्षेत्र से मिलने वाले वेतन को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पात्र वर्ग तक ही सीमित रहे।
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