Kidney Racket
Kidney Racket: उत्तर प्रदेश के कानपुर में उजागर हुए अंतरराष्ट्रीय किडनी रैकेट ने मानवीय संवेदनाओं और चिकित्सा जगत की नैतिकता को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस की तफ्तीश जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, इस काले कारोबार की परतों के नीचे छिपे खौफनाक सच सामने आ रहे हैं। हाल ही में इस गिरोह के मुख्य सरगनाओं का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसने इस पूरे नेक्सस की पोल खोलकर रख दी है। जांच के तार अब कानपुर से निकलकर गाजियाबाद और दिल्ली के बड़े अस्पतालों तक पहुंच रहे हैं।
सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे एक वीडियो में मुख्य आरोपी डॉ. अफजल और उसका साथी परवेज शैफी एक होटल के कमरे में नजर आ रहे हैं। वीडियो में बेड पर नोटों की गड्डियां बिखरी हुई हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि इंसानी अंगों की सौदेबाजी में लाखों-करोड़ों का वारा-न्यारा किया जा रहा था। यह वीडियो न केवल आरोपियों की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि यह गिरोह कितना संगठित और आर्थिक रूप से मजबूत था। पुलिस अब इस वीडियो के आधार पर धन के लेन-देन के स्रोतों की जांच कर रही है।
जांच में सामने आया है कि इस रैकेट का अहम किरदार परवेज शैफी कोई साधारण अपराधी नहीं है। वह पहले भी गाजियाबाद में लूट और डकैती जैसे संगीन अपराधों में जेल जा चुका है। इस किडनी रैकेट में उसे ‘लॉजिस्टिक्स हेड’ की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसका मुख्य काम दिल्ली और गाजियाबाद के विशेषज्ञ डॉक्टरों और तकनीशियनों की टीम को सुरक्षित रूप से कानपुर के अस्पतालों तक पहुंचाना था। इसके लिए वह लग्जरी गाड़ियां मुहैया कराता था और पुलिस की नजरों से बचने के लिए रूट प्लान तैयार करता था।
बीते रविवार को कानपुर पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए आहूजा हॉस्पिटल की घेराबंदी की और कई संदिग्धों को दबोच लिया। बताया जा रहा है कि परवेज ही वह व्यक्ति था जो पूरी सर्जिकल टीम को लेकर अस्पताल पहुंचा था। अब कानपुर पुलिस की विशेष टीमें दिल्ली और गाजियाबाद में डेरा डाले हुए हैं। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस नेटवर्क में कौन-कौन से सफेदपोश लोग और नामचीन अस्पताल शामिल हैं। इस नेक्सस के तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के कई सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों से जुड़ते दिख रहे हैं।
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने मामले का खुलासा करते हुए बताया कि शुरुआत में जिन चार लोगों को मुख्य चिकित्सक माना जा रहा था, वे वास्तव में अयोग्य निकले। इनमें रोहित तिवारी (तकनीशियन), अमित (फिजियोथेरेपिस्ट), अफजल (फार्मेसी ऑपरेटर) और वैभव (डेंटिस्ट) शामिल हैं। ये चारों आरोपी फिलहाल फरार हैं और पुलिस उनकी सरगर्मी से तलाश कर रही है। जांच में अब तक कम से कम छह अवैध किडनी प्रत्यारोपण की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से पांच अकेले अहूजा अस्पताल में किए गए थे। हालांकि, अधिकारियों को अंदेशा है कि यह संख्या कहीं अधिक हो सकती है।
इस रैकेट की कार्यप्रणाली बेहद शातिर थी। जांच में पता चला कि प्रत्यारोपण के मामलों को छिपाने के लिए मरीजों के कागजात में इसे पित्ताशय (गॉलब्लैडर) का इलाज बताया जाता था। करीब एक साल पहले इस अवैध प्रक्रिया के कारण एक महिला की मौत भी हो गई थी। उसकी मौत को दबाने के लिए उसे गॉलब्लैडर के इलाज के बहाने एक अन्य बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया गया था। इस फर्जीवाड़े में फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड तैयार करने का एक पूरा तंत्र सक्रिय था, जो मरीजों को गुमराह करता था।
पुलिस ने कानपुर के एक बिचौलिए साहिल की पहचान इस गिरोह की सबसे अहम कड़ी के रूप में की है। साहिल वह शख्स था जो जरूरतमंद मरीजों और गरीब डोनर्स के बीच सेतु का काम करता था। वह बाजार दर से लगभग आधी कीमत पर किडनी उपलब्ध कराने का लालच देकर मरीजों को फंसाता था। साहिल के जरिए ही डोनर्स को कानपुर लाया जाता था और उन्हें मामूली रकम देकर उनकी किडनी निकाल ली जाती थी। पुलिस अब साहिल की जुबान खुलवाने का प्रयास कर रही है ताकि इस गिरोह के संरक्षकों तक पहुंचा जा सके।
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