KP Unnikrishnan Passes Away
KP Unnikrishnan Passes Away: भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता केपी उन्नीकृष्णन का आज केरल के कोझिकोड स्थित एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से देश के राजनीतिक गलियारे में शोक की लहर दौड़ गई है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे राज्य के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। उन्नीकृष्णन न केवल एक राजनेता थे, बल्कि वे उस पीढ़ी के अंतिम स्तंभों में से एक थे, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र की नींव को वैचारिक मजबूती प्रदान की थी।
90 वर्ष की आयु पार कर चुके उन्नीकृष्णन पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी विभिन्न बीमारियों से जूझ रहे थे। कोझिकोड के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था, लेकिन लंबी बीमारी के बाद उन्होंने आज दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने के साथ ही केरल ने उस नेतृत्व को खो दिया है, जो संसद को केवल संख्या बल का अखाड़ा नहीं, बल्कि ‘विचारों का रंगमंच’ मानता था। उनके संसदीय भाषण आज भी तर्क और वैचारिक गहराई के लिए याद किए जाते हैं।
केपी उन्नीकृष्णन की राजनीतिक यात्रा भारत की आजादी के बाद की वैचारिक उथल-पुथल का एक जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी के साथ की थी, लेकिन 1960 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। 1962 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बनने के साथ ही उनकी राष्ट्रीय राजनीति की पारी शुरू हुई। वे एक कट्टर समाजवादी थे, जिन्होंने कांग्रेस के भीतर रहते हुए भी कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। आपातकाल (Emergency) के दौरान उन्होंने तानाशाही प्रवृत्तियों की प्रखर आलोचना की, जिसने उन्हें एक साहसी नेता के रूप में स्थापित किया।
उन्नीकृष्णन का चुनावी रिकॉर्ड उनकी लोकप्रियता और जनता के बीच उनकी गहरी पैठ का प्रमाण है। 1971 में वे पहली बार केरल की वडाकारा लोकसभा सीट से चुने गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1977, 1980, 1984, 1989 और 1991 के आम चुनावों में लगातार जीत हासिल की। छह बार सांसद रहकर उन्होंने वडाकारा को अपना ऐसा अभेद्य किला बनाया कि विरोधी पार्टियां भी उनके व्यक्तिगत प्रभाव का लोहा मानती थीं। उनका राजनीतिक आधार पार्टी की सीमाओं को लांघकर आम जनता के दिलों तक फैला हुआ था।
राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका केवल संसद तक सीमित नहीं थी। वे राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) के दौर में केंद्रीय मंत्रिमंडल का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे। उन्होंने संचार और जहाजरानी जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। एक मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली पारदर्शी और विकासोन्मुखी थी। वे जटिल राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने में माहिर माने जाते थे और गठबंधन की राजनीति के उस दौर में वे एक विश्वसनीय सेतु के रूप में कार्य करते थे।
केपी उन्नीकृष्णन का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक विचार का मौन हो जाना है। उन्होंने राजनीति को समाज सेवा और वैचारिक क्रांति का माध्यम बनाया। उनके निधन पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के राजनेताओं के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगी कि कैसे सिद्धांतों पर अडिग रहकर लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सम्मान बनाय रखा जाता है।
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