Living Statue
Living Statue: सोशल मीडिया के गलियारों में इन दिनों एक दिल दहला देने वाला वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। इस वीडियो ने नेटिज़न्स को न केवल आश्चर्यचकित किया है, बल्कि उन्हें भावुक भी कर दिया है। वीडियो में एक महिला को सड़क के किनारे बिल्कुल स्थिर अवस्था में बैठे देखा जा सकता है। उसका पूरा शरीर चमकीले सिल्वर रंग से रंगा हुआ है और चेहरा किसी दुल्हन की तरह सजाया गया है। उसकी गोद में एक छोटा बच्चा (जो संभवतः एक बेबी डॉल है) दिखाई देता है। राहगीर उसे पहली नज़र में किसी धातु या पत्थर की कलाकृति समझकर ठिठक जाते हैं। लोग उसके पास रुकते हैं, तस्वीरें खींचते हैं और कुछ सिक्के उसके सामने रख देते हैं, यह सोचे बिना कि यह कोई बेजान वस्तु नहीं बल्कि एक हाड़-मांस की इंसान है।
यह कहावत चरितार्थ होती दिखती है कि “हालात इंसान से कुछ भी करवा सकते हैं।” वीडियो में दिख रही महिला की एकाग्रता और धैर्य काबिले तारीफ है। वह घंटों तक बिना पलक झपकाए, बिना किसी शारीरिक हलचल के एक ही मुद्रा में बैठी रहती है। उसकी आंखें स्थिर हैं और चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। बहुत देर तक देखने के बाद भी लोग यह अनुमान नहीं लगा पाते कि वह जीवित है। जब वह बहुत मामूली सी हरकत करती है, तब जाकर दर्शकों को एहसास होता है कि यह एक ‘लिविंग स्टैच्यू’ (Living Statue) है। यह दृश्य दर्शकों के मन में सवाल उठाता है कि क्या यह केवल एक कला का प्रदर्शन है या अपनी और अपने परिवार की भूख मिटाने का एक कठिन रास्ता।
तकनीकी रूप से इसे ‘लिविंग स्टैच्यू आर्ट’ (Living Statue Art) कहा जाता है, जो स्ट्रीट परफॉर्मेंस का एक विश्व प्रसिद्ध रूप है। इसमें कलाकार खुद को सोने, चांदी या कांसे (Bronze) जैसे रंगों में रंग लेते हैं ताकि वे धातु की मूर्तियों जैसे दिखें। वे ऐतिहासिक या पारंपरिक वेशभूषा धारण करते हैं। इस कला की सबसे बड़ी खूबी ‘स्थिरता’ है। जब कोई दर्शक उनके सामने पैसे रखता है, तो वे धीमी गति से कोई क्रिया करते हैं, जो दर्शकों के लिए सबसे रोमांचक क्षण होता है। हालांकि, भारत जैसे देशों में इसे अक्सर कला के बजाय मजबूरी के रूप में अधिक देखा जाता है।
लंदन, पेरिस और बार्सिलोना जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय शहरों में लिविंग स्टैच्यू आर्ट को एक प्रतिष्ठित कला माना जाता है। वहां के मशहूर पर्यटक स्थलों पर ऐसे कलाकार आकर्षण का केंद्र होते हैं। कई देशों में तो इन कलाकारों के लिए बाकायदा लाइसेंस जारी किए जाते हैं और उनके बैठने का स्थान और समय भी सरकार द्वारा निर्धारित होता है। इन शहरों में कलाकार इसे एक सम्मानजनक पेशे के रूप में अपनाते हैं। हालांकि, वायरल वीडियो में दिख रही महिला की स्थिति को लेकर इंटरनेट पर बहस छिड़ी है कि क्या वह किसी प्रोफेशनल टीम का हिस्सा है या अपनी गरीबी से जूझते हुए यह रास्ता चुना है।
इस वीडियो पर यूजर्स के मिले-जुले कमेंट्स आ रहे हैं। जहां कुछ लोग महिला की अद्भुत कला की सराहना कर रहे हैं और इसे एकाग्रता का उत्कृष्ट उदाहरण मान रहे हैं, वहीं कई लोग इसे गरीबी का दुखद चेहरा बता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “यह वीडियो समाज को आईना दिखाता है कि कैसे एक मां अपने पेट के लिए पत्थर बनने को मजबूर है।” इस वायरल क्लिप ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कला और मजबूरी के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो सकती है। यह वीडियो केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की उस कड़वी सच्चाई को बयां करता है जहां इंसान को जीवित रहने के लिए ‘मूर्ति’ बनना पड़ता है।
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